Friday, September 4, 2026

हस्तरेखाशास्त्र/सामुद्रिकशास्त्र :

हस्तरेखाशास्त्र/सामुद्रिकशास्त्र : 

हस्तरेखाशास्त्र/सामुद्रिकशास्त्र : 

हथेली के मध्य भाग से प्रारम्भ शनि पर्वत की ओर जाती हुई भाग्यरेखा ( मध्यमायु से भाग्योदय ) !

मध्य हथेली से शनि पर्वत की ओर जाती भाग्यरेखा: माध्यमायु में भाग्योदय के संकेत, प्रभाव, फल, नियम और उपाय ;

भारतीय परंपरा में मनुष्य के जीवन को केवल भाग्य का खेल नहीं माना गया, बल्कि कर्म, संस्कार, पुरुषार्थ और समय—

इन चारों के समन्वय का परिणाम माना गया है। 

वैदिक ज्योतिष में जन्मकुंडली से ग्रहों की स्थिति, दशा - अंतरदशा और गोचर द्वारा जीवन के संभावित उतार - चढ़ाव का अध्ययन किया जाता है, जबकि हस्तरेखा परंपरा में हथेली की रेखाओं, पर्वतों और उनके स्वरूप को जीवन के विभिन्न क्षेत्रों के संकेतक के रूप में देखा जाता है।


amazon


ANI DIVINE Pure Metal Meru Shri Laxmi Yantra | Meru Shree Yantra || 3D Meru Shree Laxmi Yantra - 100 Gram

Visit the ANI DIVINE Store  https://link.amazon/B01FRWJy7





{ About this item

  • Maha Meru Design Significance: The intricate Maha Meru design symbolizes cosmic energy, creating a powerful vortex that attracts positive vibrations, fostering an environment of wealth, prosperity, luck, and success.
  • Experience the transformative energies of the Shree Yantra, unlocking pathways to financial gain, success, and abundance, making it a magnet for wealth and positive outcomes.
  • It is considered to be beneficial to humankind especially during Kali-Yuga to help achieve success, well being, good fortune, wealth and fame.
  • Mantra: "Om Shreem Hreem Shreem Kamle Kamalalaye Praseed, Praseed, Shreem Hreem Shreem Om Mahalaxmaye Namah" }



इसी संदर्भ में हथेली के मध्य भाग से ऊपर उठती हुई और शनि पर्वत की ओर जाने वाली भाग्यरेखा को हस्तरेखा - विचार में विशेष महत्व दिया जाता है। 

सामान्यतः शनि पर्वत मध्यमा अंगुली के नीचे स्थित माना जाता है। 

जब भाग्यरेखा हथेली के मध्य अथवा चंद्र - क्षेत्र और जीवनरेखा के आसपास के भाग से ऊपर उठकर शनि पर्वत की दिशा में जाती है, तो पारंपरिक हस्तरेखा शास्त्र इसे व्यक्ति के कर्मक्षेत्र, जीवन - दिशा और धीरे - धीरे विकसित होने वाले भाग्य से जोड़कर देखता है।

लेकिन यहां एक महत्वपूर्ण बात समझना आवश्यक है—

हस्तरेखा या ज्योतिष को आधुनिक वैज्ञानिक भविष्यवाणी की निश्चित विधि नहीं माना जाता। 

इस लिए किसी रेखा के आधार पर निश्चित आयु, धन, विवाह, मृत्यु या घटना का दावा करना उचित नहीं है। 

शास्त्रीय परंपराओं में भी संकेतों को अन्य संकेतों के साथ मिलाकर देखने की आवश्यकता बताई जाती है। 

अतः नीचे दिया गया विवेचन पारंपरिक ज्योतिष एवं हस्तरेखा-दृष्टि से समझने योग्य है।


कई बार शनिरेखा हथेली के नीचे से प्रारम्भ न होकर हथेली के मध्य भाग में कुछ ऊपर से प्रारम्भ होती है। 

इस केस में जातक के जीवन का पूवार्द्ध नगण्य - सा होता है। 

जातक का बचपन ही गौरवशाली नहीं होता परन्तु जवानी में प्रवेश करते - करते जब इस रेखा का प्रारम्भिक काल प्रभावित होगा तब जातक सफलता की ओर प्रवेश करते हुए उपलब्धियां अर्जित करेगा। 

ऐसे जातकों के बारे में कहा जा सकता है कि ये 'मुंह में सोने के चम्मच' के साथ पैदा नहीं हुए हैं। 

अर्थात जन्म से धनाढ्य या भाग्शाली नहीं हैं। 

भाग्यरेखा जब शुरू होती है उसी समय जातक का स्वर्णिम काल प्रारम्भ होता है। 

शनि रेखा की अनुपस्थिति बतलाती है कि लगातार प्रयत्न की अत्यन्त आवश्यकता है।


भाग्यरेखा और शनि पर्वत का संबंध :


हस्तरेखा परंपरा में शनि पर्वत का संबंध मुख्यतः कर्म, जिम्मेदारी, अनुशासन, धैर्य, विलंब से मिलने वाली सफलता और जीवन के गंभीर अनुभवों से जोड़ा जाता है।

यदि भाग्यरेखा हथेली के मध्य भाग से उठकर शनि पर्वत की ओर स्पष्ट रूप से जाती है, तो इसका पारंपरिक अर्थ यह लिया जाता है कि व्यक्ति का जीवन अपने कर्म और प्रयत्नों के आधार पर धीरे - धीरे स्थिरता प्राप्त कर सकता है।

ऐसी रेखा वाले व्यक्ति के बारे में पारंपरिक हस्तरेखा - विचार में कहा जाता है कि जीवन के आरंभिक चरणों की तुलना में मध्य आयु के बाद कर्मफल अधिक स्पष्ट दिखाई दे सकता है।

इसी कारण इसे कभी - कभी सामान्य भाषा में “माध्यमायु से भाग्योदय” का संकेत कहा जाता है।

परंतु केवल भाग्यरेखा देखकर यह कहना कि अमुक व्यक्ति को ठीक 40, 45 या 50 वर्ष की आयु में धन मिलेगा—

शास्त्रीय दृष्टि से भी अत्यधिक सरलीकरण होगा। 

आयु - निर्धारण के लिए रेखा की स्थिति, उसके आरंभ, शाखाओं, कटाव, जीवनरेखा और अन्य प्रमुख रेखाओं को साथ देखना पड़ता है।

मध्य हथेली से भाग्यरेखा निकलने का संकेत :


यदि भाग्यरेखा हथेली के मध्य क्षेत्र से प्रारंभ होती है और बिना अधिक टूटे शनि पर्वत की ओर बढ़ती है, तो पारंपरिक हस्तरेखा शास्त्र इसे स्वनिर्मित कर्मफल की दिशा में संकेत मानता है।

ऐसे व्यक्ति को जीवन में सफलता किसी एक अचानक प्राप्त अवसर से नहीं, बल्कि अनुभव और निरंतर परिश्रम से मिलने वाली मानी जाती है।

आरंभिक जीवन में नौकरी बदलना, व्यवसाय में संघर्ष, आर्थिक उतार - चढ़ाव या दिशा तलाशने जैसी परिस्थितियां हो सकती हैं। 

लेकिन जैसे - जैसे अनुभव बढ़ता है, व्यक्ति अपनी क्षमता पहचानने लगता है।

यही कारण है कि इस प्रकार की भाग्यरेखा को कभी - कभी “देरी से लेकिन टिकाऊ सफलता” का संकेत माना जाता है।

यदि भाग्यरेखा गहरी और स्पष्ट हो :


गहरी, सीधी और स्पष्ट भाग्यरेखा को पारंपरिक हस्तरेखा - विचार में शुभ माना जाता है।

इसके संभावित संकेत इस प्रकार बताए जाते हैं—

- कर्मक्षेत्र में स्थिरता।
- जिम्मेदार पद प्राप्त होने की संभावना।
- कार्य में अनुशासन।
- कठिन परिस्थितियों में टिके रहने की क्षमता।
- जीवन के मध्य चरण में स्थिति का मजबूत होना।
- अपने निर्णयों के आधार पर आगे बढ़ने की प्रवृत्ति।

यदि यही रेखा शनि पर्वत तक स्पष्ट रूप से पहुंचती हो और वहां जाकर अत्यधिक जाल या अव्यवस्था न बने, तो पारंपरिक मत में कर्मफल की स्थिरता का संकेत मजबूत माना जाता है।

यदि भाग्यरेखा देर से स्पष्ट होती है :


कई हथेलियों में भाग्यरेखा नीचे की ओर हल्की दिखाई देती है, लेकिन हथेली के मध्य भाग के बाद अधिक गहरी हो जाती है।

हस्तरेखा परंपरा में इसे जीवन के प्रारंभिक चरण में संघर्ष और बाद में परिस्थितियों के स्थिर होने का संकेत माना जाता है।

उदाहरण के लिए, मान लीजिए किसी व्यक्ति की भाग्यरेखा हथेली के निचले भाग में बहुत हल्की है, लेकिन मध्य भाग से ऊपर जाकर गहरी हो जाती है। 

पारंपरिक व्याख्या यह हो सकती है कि व्यक्ति को प्रारंभिक जीवन में अपनी दिशा खोजने में समय लगा, लेकिन अनुभव बढ़ने के साथ कार्यक्षेत्र में स्थिरता आई।

इस का अर्थ यह नहीं कि उसके जीवन में निश्चित रूप से धन आएगा; बल्कि यह कर्मक्षेत्र में क्रमिक मजबूती का संकेत माना जाता है।

भाग्यरेखा में टूटन हो तो क्या अर्थ ?


यदि भाग्यरेखा बीच में टूटती है, तो हस्तरेखा शास्त्र में इसे जीवन के किसी चरण में कर्मक्षेत्र अथवा जीवन - दिशा में परिवर्तन से जोड़ा जाता है।

ऐसे परिवर्तन नौकरी, व्यवसाय, स्थान परिवर्तन, पारिवारिक जिम्मेदारी या जीवन की प्राथमिकताओं में बदलाव के रूप में दिखाई दे सकते हैं।

यदि टूटन के बाद रेखा और अधिक गहरी होकर आगे बढ़ती है, तो पारंपरिक दृष्टि से इसे परिवर्तन के बाद नई दिशा मिलने का संकेत माना जा सकता है।

लेकिन यदि अनेक क्रॉस, द्वीप, जाल और अव्यवस्थित रेखाएं भाग्यरेखा को प्रभावित कर रही हों, तो हस्तरेखा - विचार में इसे संघर्षपूर्ण समय का संकेत माना जाता है।

भाग्यरेखा पर सूर्यरेखा का प्रभाव :


भाग्यरेखा के साथ सूर्यरेखा का अध्ययन भी किया जाता है।

सूर्यरेखा को परंपरागत रूप से प्रतिष्ठा, प्रतिभा, यश और सामाजिक पहचान से जोड़ा जाता है।

यदि भाग्यरेखा स्पष्ट हो और सूर्यरेखा भी मजबूत हो, तो पारंपरिक हस्तरेखा - विचार में यह माना जा सकता है कि व्यक्ति को अपने कर्म के साथ - साथ प्रतिष्ठा और पहचान भी प्राप्त हो सकती है।

विशेष रूप से कला, लेखन, शिक्षा, प्रशासन, सार्वजनिक कार्य या रचनात्मक क्षेत्र में इसका अलग अर्थ निकाला जा सकता है।

गुरु पर्वत से संबंध :


यदि भाग्यरेखा से कोई शाखा गुरु पर्वत की ओर जाती है, तो पारंपरिक मत में इसका संबंध नेतृत्व, ज्ञान, मार्गदर्शन, पद और महत्वाकांक्षा से जोड़ा जाता है।

ऐसे योग में व्यक्ति अपने कार्यक्षेत्र में केवल नौकरी करने के बजाय जिम्मेदारी लेने, नेतृत्व करने या स्वयं निर्णय लेने की ओर बढ़ सकता है।

बुध पर्वत की ओर शाखा :


यदि भाग्यरेखा से शाखा बुध पर्वत की ओर जाए, तो पारंपरिक हस्तरेखा में इसे व्यापार, संचार, बुद्धि, लेखन, गणना और व्यावसायिक कौशल से जोड़ा जाता है।

इसलिए किसी व्यक्ति की भाग्यरेखा शनि पर्वत की ओर जाती हो और उससे बुध पर्वत की ओर शाखा निकलती हो, तो पारंपरिक दृष्टि से व्यापारिक अथवा बौद्धिक कार्यों में उन्नति का संकेत माना जा सकता है।

चंद्र क्षेत्र से आने वाली भाग्यरेखा :


यदि भाग्यरेखा हथेली के बाहरी निचले भाग अर्थात चंद्र क्षेत्र से उठकर शनि पर्वत की ओर जाती है, तो हस्तरेखा परंपरा में इसे दूसरों के सहयोग, जनता से संपर्क, कल्पनाशक्ति, यात्रा अथवा बाहरी वातावरण से मिलने वाले अवसरों से जोड़ा जाता है।

इस के विपरीत यदि रेखा जीवनरेखा के निकट से निकलती है, तो व्यक्ति के स्वयं के प्रयास और परिवार अथवा व्यक्तिगत जिम्मेदारियों का प्रभाव अधिक माना जाता है।

वैदिक ज्योतिष में शनि का महत्व :


वैदिक ज्योतिष में शनि को कर्म, अनुशासन, श्रम, विलंब, जिम्मेदारी और जीवन के कठिन अनुभवों का महत्वपूर्ण कारक माना जाता है।

इसी लिए हस्तरेखा में शनि पर्वत और भाग्यरेखा का संबंध देखते समय ज्योतिषीय दृष्टि से जन्मकुंडली के शनि को भी परंपरागत रूप से देखा जा सकता है।

उदाहरण के लिए—


यदि किसी कुंडली में शनि कर्मभाव से संबंधित होकर शुभ स्थिति में हो और हथेली में भाग्यरेखा भी मजबूत दिखाई दे, तो दोनों प्रणालियों की पारंपरिक व्याख्या में कर्मक्षेत्र में स्थिरता का संकेत अधिक मजबूत माना जा सकता है।

लेकिन यदि कुंडली में शनि कठिन स्थिति में हो, तो इसका अर्थ यह नहीं कि भाग्यरेखा शुभ होने के बावजूद व्यक्ति असफल होगा। 

बल्कि पारंपरिक ज्योतिष में दशा, अंतरदशा, गोचर, लग्न, दशम भाव और उसके स्वामी सहित अनेक तत्व देखे जाते हैं।

गोचर और भाग्योदय :


ज्योतिषीय परंपरा में शनि के गोचर को दीर्घकालिक परिवर्तन से जोड़ा जाता है।

किसी व्यक्ति की भाग्यरेखा मध्य आयु में गहरी होती दिखाई दे और उसी जीवनकाल में कुंडली की दशा अथवा गोचर कर्मभाव को सक्रिय करे, तो पारंपरिक ज्योतिषी इसे जीवन में जिम्मेदारी और कर्मक्षेत्र के परिवर्तन का संभावित समय मान सकते हैं।

लेकिन यहां भी यह समझना जरूरी है कि हस्तरेखा और गोचर को मिलाकर भी निश्चित घटना की गारंटी नहीं दी जा सकती।

कृष्णमूर्ति पद्धति की दृष्टि :


कृष्णमूर्ति पद्धति अर्थात KP Astrology में फलादेश मुख्यतः भावों, नक्षत्र स्वामी और सब-लॉर्ड की सूक्ष्म व्याख्या पर आधारित होता है।

कर्म और पेशे से जुड़े प्रश्नों में सामान्यतः 2, 6, 10 और 11 भावों को विशेष महत्व दिया जाता है—

परंपरागत KP विश्लेषण में इन भावों की संबंधित significations को देखकर नौकरी, सेवा, व्यवसाय अथवा लाभ की संभावना का अध्ययन किया जाता है।

इस लिए यदि कोई व्यक्ति पूछे—

“मेरी हथेली की भाग्यरेखा मध्य आयु में क्यों मजबूत हुई?”—

तो केवल हथेली देखकर निष्कर्ष निकालने के बजाय जन्मसमय उपलब्ध हो तो कुंडली के दशम भाव, उसके स्वामी, नक्षत्र स्वामी और संबंधित दशा को भी देखा जा सकता है।

अंकशास्त्र का सहायक दृष्टिकोण :


अंकशास्त्र में जन्मांक और भाग्यांक के आधार पर व्यक्ति की प्रवृत्तियों की पारंपरिक व्याख्या की जाती है।

उदाहरण के लिए यदि किसी व्यक्ति का अंक शनि से संबंधित माना जाता हो, तो अनुशासन, धैर्य और धीरे - धीरे उपलब्धि की व्याख्या की जा सकती है।

लेकिन अंकशास्त्र, हस्तरेखा और ज्योतिष तीनों अलग - अलग परंपराएं हैं। 

इन के नियमों को मिलाते समय सावधानी आवश्यक है।

सामुद्रिक शास्त्र और हथेली :


सामुद्रिक परंपरा में शरीर के विभिन्न अंगों के आकार, स्वरूप और लक्षणों को संकेतात्मक रूप से देखा जाता है।

हथेली का आकार, अंगुलियों की लंबाई, पर्वतों की उन्नति और रेखाओं की स्पष्टता को एक साथ देखने की परंपरा है।

इसलिए केवल भाग्यरेखा को देखकर व्यक्ति का संपूर्ण जीवन निर्धारित करना उचित नहीं है।

हथेली का संपूर्ण स्वरूप ही संकेतों की पूरी तस्वीर देता है।

शास्त्रोक्त मंत्र और कर्म का संदेश :


शनि और कर्म के संदर्भ में सबसे महत्वपूर्ण वैदिक संदेशों में से एक कर्म की शुद्धता है।

भगवद्गीता का प्रसिद्ध श्लोक है—

“कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन।”

अर्थात मनुष्य का अधिकार कर्म करने में है, केवल फल पर नहीं।

शनि संबंधी पारंपरिक साधना में निम्न मंत्र का जप किया जाता है—

“ॐ शं शनैश्चराय नमः।”

अर्थ: शनि देव को नमस्कार।

इस मंत्र का उपयोग पारंपरिक रूप से शनि उपासना में किया जाता है। 

इसे श्रद्धापूर्वक, शांत मन से और नियमित रूप से जपना साधना का एक सामान्य रूप माना जाता है।

एक अन्य वैदिक मंत्र है—

“ॐ त्र्यम्बकं यजामहे सुगन्धिं पुष्टिवर्धनम्।
उर्वारुकमिव बन्धनान्मृत्योर्मुक्षीय मामृतात्॥”

इसका भावार्थ है—

हम त्रिनेत्रधारी परमात्मा की उपासना करते हैं, जो जीवन का पोषण करते हैं; जैसे पककर फल बेल से सहज रूप से अलग होता है, वैसे ही हमें बंधनों से मुक्त करें और अमृतस्वरूप सत्य से विमुख न करें।

इस मंत्र का मूल उद्देश्य आध्यात्मिक शरण और कल्याण की प्रार्थना है; इसे केवल भाग्यरेखा बदलने का यांत्रिक उपाय समझना उचित नहीं है।

शनि के लिए पारंपरिक उपाय :



पहला— ईमानदार कर्म।

किसी भी शनि साधना का मूल आधार कर्म की शुद्धता माना जाना चाहिए।

दूसरा— सेवा।

असहाय, वृद्ध और जरूरतमंद लोगों की यथाशक्ति सेवा करना भारतीय धार्मिक परंपरा में पुण्यकारी माना गया है।

तीसरा— अनुशासन।

समय पर कार्य करना, वचन का पालन करना और परिश्रम करना शनि के सकारात्मक गुणों के रूप में देखा जाता है।

चौथा— मंत्रजप।

“ॐ शं शनैश्चराय नमः” का श्रद्धापूर्वक जप किया जा सकता है।

पांचवां— शनिवार की साधना।

परंपरा में शनिवार को शनि उपासना, संयम और सेवा का दिन माना जाता है।

यह ध्यान रखना चाहिए कि किसी भी उपाय को आर्थिक शोषण, भय या अंधविश्वास का साधन नहीं बनाना चाहिए।

एक उदाहरण से समझिए :


मान लीजिए 48 वर्षीय व्यक्ति की हथेली में भाग्यरेखा नीचे हल्की है, मध्य भाग से स्पष्ट होती है और ऊपर जाकर शनि पर्वत के नीचे तक मजबूत दिखाई देती है।

साथ में सूर्यरेखा भी स्पष्ट है और भाग्यरेखा पर कोई बड़ी टूटन नहीं है।

पारंपरिक हस्तरेखा - विचार में इसका अर्थ यह निकाला जा सकता है कि व्यक्ति ने जीवन के प्रारंभिक वर्षों में संघर्ष किया, लेकिन अनुभव के साथ उसका कर्मक्षेत्र स्थिर हुआ और मध्य आयु में प्रतिष्ठा बढ़ने की संभावना बनी।

यदि जन्मकुंडली में भी दशम भाव और शनि मजबूत संकेत दे रहे हों, तो ज्योतिषीय परंपरा इस निष्कर्ष को और समर्थन दे सकती है।

लेकिन यदि वही व्यक्ति लगातार मेहनत न करे, गलत निर्णय ले और अपने अवसरों का उपयोग न करे, तो केवल रेखा उसके लिए सफलता पैदा नहीं कर सकती।

यही कर्म और भाग्य का वास्तविक संतुलन है।

भाग्यरेखा का सबसे बड़ा रहस्य :


भाग्यरेखा का सबसे बड़ा रहस्य धन नहीं, बल्कि दिशा है।

रेखा यह नहीं कहती कि “तुम्हें निश्चित रूप से इतना धन मिलेगा।” 

बल्कि पारंपरिक हस्तरेखा दृष्टि में यह संकेत देती है कि व्यक्ति का कर्मक्षेत्र किस प्रकार विकसित हो सकता है।

मध्य हथेली से शनि पर्वत की ओर बढ़ती स्पष्ट भाग्यरेखा का संदेश इस रूप में समझा जा सकता है—

“जीवन में देर हो सकती है, लेकिन निरंतर कर्म करने वाला व्यक्ति अनुभव के साथ अपनी स्थिति मजबूत कर सकता है।”

यह शनि का भी मूल प्रतीक है—

विलंब, लेकिन परिश्रम से प्राप्त स्थायित्व।

निष्कर्ष

मध्य हथेली से उठकर शनि पर्वत की ओर जाने वाली भाग्यरेखा को भारतीय हस्तरेखा परंपरा में कर्म, जिम्मेदारी, जीवन - दिशा और मध्य आयु के बाद बढ़ती स्थिरता से जोड़ा जाता है। 

यदि रेखा स्पष्ट, गहरी और संतुलित हो तो इसे सकारात्मक संकेत माना जाता है; यदि उसमें टूटन, द्वीप, क्रॉस या अनेक बाधक रेखाएं हों तो जीवन के संबंधित चरणों में परिवर्तन अथवा संघर्ष के संकेत माने जाते हैं।

लेकिन वास्तविक फलादेश के लिए भाग्यरेखा अकेली पर्याप्त नहीं है। 

जीवनरेखा, मस्तिष्करेखा, हृदयरेखा, सूर्यरेखा, शनि पर्वत, गुरु पर्वत, बुध पर्वत तथा हथेली के संपूर्ण स्वरूप को साथ देखना चाहिए। 

ज्योतिषीय दृष्टि से जन्मकुंडली में लग्न, दशम भाव, शनि, दशा - अंतरदशा और गोचर का अध्ययन अलग से किया जा सकता है।

अंततः भारतीय शास्त्रीय चिंतन का सबसे सुंदर संदेश यही है कि मनुष्य अपने कर्म से भाग्य को अर्थ देता है।

रेखा संकेत दे सकती है, लेकिन कर्म जीवन की दिशा बनाता है।

इसलिए यदि आपकी हथेली में मध्य भाग से शनि पर्वत की ओर जाती हुई भाग्यरेखा है, तो इसे भय का कारण नहीं बल्कि एक प्रेरक संकेत मानें—
धैर्य रखें, ईमानदारी से कर्म करें, अनुशासन अपनाएं, सेवा करें और अपने अवसरों का सदुपयोग करें।

यही शनि का वास्तविक पाठ है और यही “माध्यमायु से भाग्योदय” के रहस्य को समझने का सबसे संतुलित मार्ग है। पंडारामा प्रभु राज्यगुरु  !!!!! शुभमस्तु !!!

🙏हर हर महादेव हर...!!
जय माँ अंबे ...!!!🙏🙏

पंडित राज्यगुरु प्रभुलाल पी. वोरिया क्षत्रिय राजपूत जड़ेजा कुल गुर:-
PROFESSIONAL ASTROLOGER EXPERT IN:- 
-: 1987 YEARS ASTROLOGY EXPERIENCE :-
(2 Gold Medalist in Astrology & Vastu Science) 
" Opp. Shri Ramanatha Swami Kovil Car Parking Ariya Strits , Nr. Maghamaya Amman Covil Strits, V.O.C. Nagar , RAMESHWARM - 623526 ( TAMILANADU )
सेल नंबर: . ‪+ 91- 7010668409‬ / ‪+ 91- 7598240825‬ ( तमिलनाडु )
Skype : astrologer85 Web: Sarswatijyotish.com
Email: prabhurajyguru@gmail.com
आप इसी नंबर पर संपर्क/सन्देश करें...धन्यवाद.. 
नोट ये मेरा शोख नही हे मेरा जॉब हे कृप्या आप मुक्त सेवा के लिए कष्ट ना दे .....
जय द्वारकाधीश....
जय जय परशुरामजी...🙏🙏🙏

No comments:

Post a Comment

हस्तरेखाशास्त्र/सामुद्रिकशास्त्र :

हस्तरेखाशास्त्र/सामुद्रिकशास्त्र :  हस्तरेखाशास्त्र/सामुद्रिकशास्त्र :  हथेली के मध्य भाग से प्रारम्भ शनि पर्वत की ओर जाती हुई भाग्यरेखा ( म...