Friday, September 18, 2026

अंक ज्योतिष ( Numerology ) - अंकशास्त्र से नाम में परिवर्तन करके नसीब पर विजय प्राप्त करें ?

अंक ज्योतिष  ( Numerology  ) - अंकशास्त्र से नाम में परिवर्तन करके नसीब पर विजय प्राप्त करें ?

अंक ज्योतिष  ( Numerology  ) - अंकशास्त्र से नाम में परिवर्तन करके नसीब पर विजय प्राप्त करें ?

नाम, नक्षत्र, ग्रह, अंक और कर्मफल का शास्त्रीय संबंध ;

मनुष्य के जीवन में “नाम” केवल पहचान बताने वाला शब्द नहीं माना गया। 

भारतीय परम्परा में नाम को संस्कार, ध्वनि, देवता, नक्षत्र और सामाजिक व्यवहार से जोड़ा गया है। 

इसी कारण हिन्दू धर्म में नामकरण - संस्कार को महत्वपूर्ण संस्कार माना गया।


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लेकिन आज नाम और अंकशास्त्र के विषय में दो बिल्कुल अलग परम्पराओं को मिला दिया जाता है।


एक ओर है—


वैदिक नामकरण परम्परा, जिसमें जन्मकालीन नक्षत्र, उसके पाद, चन्द्रस्थिति तथा शुभ अक्षर को महत्व दिया जाता है।


दूसरी ओर है—


आधुनिक नाम-अंकशास्त्र, जिसमें नाम के अक्षरों को संख्यात्मक मूल्य देकर कुल संख्या निकाली जाती है और उसे जन्मांक, भाग्यांक अथवा अन्य संख्याओं के साथ मिलाया जाता है।


इस लिए सबसे पहले यह समझना आवश्यक है कि नाम बदलना और जन्मकुण्डली बदलना दो अलग बातें हैं।


जन्म के समय सूर्य, चन्द्रमा और ग्रह जिस राशि, भाव, नक्षत्र तथा अंश में स्थित थे, वह जन्मकुण्डली का आधार है। 

बाद में व्यक्ति अपना नाम बदल दे तो जन्म के समय का ग्रह - स्थान नहीं बदलता।

इस लिए “नाम बदलकर ग्रहों की जन्मस्थिति बदल देना” शास्त्रीय ज्योतिष का सिद्धान्त नहीं है।

हाँ, नाम की ध्वनि, प्रयोग, सामाजिक पहचान, मानसिक संस्कार और शुभ - अशुभ अक्षर को परम्परा में महत्व दिया गया है। 


इसी कारण नाम का विचार निरर्थक भी नहीं है।


नामकरण का वास्तविक शास्त्रीय आधार ;


वैदिक परम्परा में नामकरण केवल आधुनिक “ब्रांड नेम” चुनने की प्रक्रिया नहीं थी।

नामकरण - संस्कार का सम्बन्ध बालक के जन्म, परिवार, कुल, देवता, नक्षत्र और शुभ ध्वनि से जोड़ा गया।

भगवान श्रीकृष्ण के नामकरण का प्रसिद्ध उदाहरण भी इसी बात को स्पष्ट करता है। 

गार्ग मुनि को बुलाकर नामकरण संस्कार कराया गया और “कृष्ण” नाम का अर्थ एवं अक्षरों की व्याख्या की गई। 

गार्ग - संबंधी परम्परा में नामकरण को एक संस्कार के रूप में प्रस्तुत किया गया है।

अर्थात् प्राचीन दृष्टि में नाम कोई मनमाना अक्षर - संग्रह नहीं था।


नाम = अर्थ + ध्वनि + संस्कार + पहचान।


इसी लिए किसी बच्चे का नाम केवल इस आधार पर रखना कि “इस नाम की संख्या 5 आती है इस लिए जीवनभर धन मिलेगा”—

यह शास्त्रीय नामकरण की पूरी पद्धति नहीं है।


नक्षत्र और नाम का सम्बन्ध ;


वैदिक ज्योतिष की नामकरण - पद्धति में सबसे महत्वपूर्ण विषयों में से एक है—

जन्म नक्षत्र और उसका पाद।

27 नक्षत्रों को चार - चार पादों में विभाजित किया जाता है।


इस प्रकार:


27 × 4 = 108 पाद।


प्रत्येक पाद से एक विशिष्ट प्रारम्भिक ध्वनि जोड़ी जाती है। 

इस लिए पारम्परिक नामकरण में जन्म नक्षत्र और पाद देखकर नाम का प्रारम्भिक अक्षर अथवा स्वर निर्धारित किया जाता है।


उदाहरण के रूप में अश्विनी के लिए परम्परागत ध्वनियाँ—


चु, चे, चो, ला


मानी जाती हैं।


भरणी के लिए—


ली, लू, ले, लो


और कृत्तिका के लिए—


अ, ई, उ, ए


जैसी ध्वनियाँ मिलती हैं।

इस का अर्थ यह नहीं कि इन अक्षरों से शुरू होने वाला हर नाम निश्चित रूप से भाग्यशाली होगा।

अर्थ यह है कि नाम की प्रथम ध्वनि को जन्मकालीन नक्षत्र से सामंजस्य देने की एक पारम्परिक पद्धति है।


नाम केवल पहला अक्षर नहीं है ;


यहाँ आधुनिक नाम - अंकशास्त्र में सबसे बड़ी भूल होती है।

किसी व्यक्ति का नाम केवल “A” या “R” से शुरू होता है, इसलिए उसे सूर्य अथवा चन्द्र से जोड़ देना पर्याप्त नहीं।

शास्त्रीय दृष्टि में नाम की ध्वनि, उच्चारण, अर्थ और जन्मकालीन ग्रह - नक्षत्र की स्थिति को अलग - अलग समझना चाहिए।

वराहमिहिर की बृहत्संहिता में नाम के अक्षरों के निर्धारण से सम्बन्धित अत्यन्त रोचक ज्योतिषीय पद्धति मिलती है। 

वहाँ लग्न, नवांश, राशि की विषमता - समता तथा ग्रहों की स्थिति आदि से नाम के अक्षरों की रचना के सम्बन्ध में नियम दिए गए हैं।


इस से एक महत्वपूर्ण बात सिद्ध होती है—


प्राचीन ज्योतिष में नाम को ज्योतिषीय गणना से जोड़ने की परम्परा थी, लेकिन वह आज के केवल “अंग्रेजी spelling बदलो और number बदलो” वाले सरल नियम से कहीं अधिक जटिल थी।


क्या नाम बदलने से जन्मकुण्डली बदलती है ?


नहीं।

यदि किसी व्यक्ति का जन्म 10 तारीख को हुआ और जन्म के समय उसकी कुण्डली में शनि दशम भाव में था, तो बाद में वह अपना नाम दस बार बदल दे, जन्मकुण्डली में शनि दशम भाव से हटकर दूसरे भाव में नहीं चला जाएगा।

इसी प्रकार—


लग्न नहीं बदलेगा।

जन्म नक्षत्र नहीं बदलेगा।

चन्द्र राशि नहीं बदलेगी।

जन्मकालीन ग्रहबल नहीं बदलेगा।

विम्शोत्तरी दशा का प्रारम्भ नहीं बदलेगा।

नवांश की गणना नहीं बदलेगी।

इस लिए नाम परिवर्तन को कुण्डली परिवर्तन कहना शास्त्रीय दृष्टि से उचित नहीं है।

आधुनिक नाम - अंकशास्त्र की अपनी गणना हो सकती है, लेकिन वह जन्मकुण्डली के ग्रहों की वास्तविक स्थिति को नहीं बदलती। 

आधुनिक स्रोत भी स्पष्ट रूप से इस अन्तर को स्वीकार करते हैं कि name correction से जन्मकुण्डली के ग्रह और जन्मदशाएँ नहीं बदलतीं।

फिर नाम परिवर्तन का महत्व क्या है ?


यदि जन्मकुण्डली नहीं बदलती तो नाम का महत्व कहाँ है ?

यहीं पर विषय सूक्ष्म हो जाता है।

मनुष्य अपने नाम को प्रतिदिन सुनता है।

दूसरे लोग उसे उसी नाम से पुकारते हैं।

उसकी सामाजिक पहचान उसी नाम से बनती है।

उसके दस्तावेज उसी नाम से होते हैं।

व्यक्ति स्वयं अपने नाम से मानसिक रूप से जुड़ता है।

अर्थात् नाम एक प्रकार का निरन्तर दोहराया जाने वाला शब्द - संस्कार है।

इस लिए यदि कोई नाम जन्म नक्षत्र की पारम्परिक ध्वनि से मेल खाता है, अर्थ की दृष्टि से शुभ है और व्यक्ति उस नाम को नियमित रूप से स्वीकार करता है, तो परम्परागत दृष्टि से उसका महत्व हो सकता है।

लेकिन यहाँ भी यह कहना कि—


“बस spelling में एक A जोड़ दो और करोड़पति बन जाओगे”

शास्त्रीय प्रमाण से बहुत आगे की बात हो जाती है।

अंकशास्त्र का वास्तविक प्रश्न ;


अब आता है अंकशास्त्र ( Numerology )।

भारतीय समाज में आज मुख्यतः दो प्रकार की नाम - अंक पद्धतियाँ दिखाई देती हैं—

1. पश्चिमी/Pythagorean आधारित प्रणाली
2. Chaldean आधारित प्रणाली

Chaldean पद्धति में अक्षरों को संख्यात्मक मान दिए जाते हैं और नाम की कुल संख्या निकाली जाती है। 

आधुनिक भारतीय numerology में इसी प्रकार नामांक, जन्मांक और भाग्यांक की तुलना की जाती है।

उदाहरण के लिए किसी प्रणाली में—


A = 1
B = 2
C = 3

आदि मान देकर नाम का कुल योग निकाला जाता है।

लेकिन यहाँ सावधानी आवश्यक है।

यह आधुनिक numerological calculation है; इसे सीधे ऋग्वेद या बृहत्पाराशरी होरा शास्त्र का मूल सिद्धान्त बताना उचित नहीं है।

एक आधुनिक numerology स्रोत भी स्वयं स्वीकार करता है कि classical Vedic Jyotisha texts और modern English-alphabet name numerology अलग परम्पराएँ हैं।

नामांक, मूलांक और भाग्यांक ;


आधुनिक अंकशास्त्र में सामान्यतः तीन प्रमुख बातें देखी जाती हैं।

मूलांक ;


जन्म की तारीख से प्राप्त संख्या।

उदाहरण—

14 तारीख को जन्म:

1 + 4 = 5

अतः मूलांक 5।

भाग्यांक ;


पूरी जन्मतिथि के अंकों का योग।

उदाहरण के लिए केवल समझाने हेतु:

14-08-1985

1+4+0+8+1+9+8+5 = 36

3+6 = 9

अतः भाग्यांक 9।

नामांक ;


नाम के अक्षरों को संबंधित अंक देकर कुल योग निकाला जाता है।

यहीं से नाम बदलने का आधुनिक विचार आता है।

लेकिन किसी व्यक्ति की पूरी जन्मकुण्डली को छोड़कर केवल इन तीन संख्याओं से जीवन का सम्पूर्ण निर्णय करना शास्त्रीय ज्योतिष की पद्धति नहीं है।

“नसीब पर विजय” का सही अर्थ " ;


“नसीब पर विजय” शब्द बहुत आकर्षक है, लेकिन शास्त्रीय दृष्टि से इसे सावधानी से समझना चाहिए।

यदि इस का अर्थ है—


“नाम बदलते ही जन्मकर्म समाप्त हो जाएंगे और ग्रहों का फल नष्ट हो जाएगा”

तो ऐसा दावा शास्त्रीय रूप से सिद्ध नहीं है।

यदि इसका अर्थ है—

“नाम, आचरण, संस्कार, साधना, कर्म और उचित समय - निर्णय को सुधारकर जीवन में उपलब्ध शुभ अवसरों का बेहतर उपयोग किया जा सकता है”

तो यह अधिक संतुलित और भारतीय कर्म-सिद्धान्त के अनुरूप व्याख्या है।

कुण्डली में योग होना एक बात है।

उस योग का दशा - गोचर से सक्रिय होना दूसरी बात है।

व्यक्ति का पुरुषार्थ तीसरी बात है।

वास्तु, आचार, मंत्र, दान, उपासना आदि को परम्पराएँ चौथे स्तर पर रखती हैं।

नाम इनमें से केवल एक घटक है।

केवल नामांक देखकर नाम बदलना क्यों गलत हो सकता है ?


मान लीजिए किसी व्यक्ति का नामांक 8 आया।

किसी numerologist ने कह दिया—

“8 अशुभ है, नाम बदलो।”

यह अधूरा निष्कर्ष है।

पहले देखना चाहिए—

जन्मांक क्या है ?


भाग्यांक क्या है ?


जन्म नक्षत्र क्या है ?


चन्द्र किस राशि में है ?


नाम का प्रारम्भिक अक्षर नक्षत्रानुकूल है या नहीं ?


जन्मकुण्डली में शनि का स्थान कैसा है ?


शनि किस भाव का स्वामी है ?


शनि उच्च, नीच, स्वक्षेत्री, मित्र या शत्रु राशि में है ?


षड्बल क्या है ?


दशा कौन सी चल रही है ?


गोचर क्या है ?


व्यक्ति का वास्तविक व्यवसाय क्या है ?


नाम का उपयोग किस रूप में होता है ?


इन सबको छोड़कर केवल “8 खराब है” कहना शास्त्रीय परीक्षण नहीं है।





नाम बदलने से पहले जन्मकुण्डली क्यों देखनी चाहिए ?


उदाहरण के लिए किसी व्यक्ति की कुण्डली में बुध अत्यन्त बलवान हो।

वह व्यक्ति लेखन, गणना, व्यापार, शिक्षा, संचार या वाणिज्य से जुड़ा हो।

अब केवल अंकगणित के आधार पर ऐसा नाम चुन दिया जाए जो परम्परागत रूप से व्यक्ति की जन्म - ध्वनि, अर्थ और सामाजिक पहचान से मेल न खाता हो, तो केवल संख्या के कारण उसे श्रेष्ठ कहना उचित नहीं।

इसी प्रकार किसी व्यक्ति के जीवन में विवाह, संतान, व्यवसाय, स्वास्थ्य या ऋण से सम्बन्धित प्रश्न हो तो केवल नामांक से उसका निर्णय करना और दशम, सप्तम, पंचम, षष्ठ आदि भावों को छोड़ देना ज्योतिष की पूर्ण पद्धति नहीं है।

नक्षत्र, नाम और चन्द्रमा ;


नामकरण में नक्षत्र की भूमिका समझने के लिए चन्द्रमा को समझना आवश्यक है।

वैदिक ज्योतिष में चन्द्रमा मन, स्मृति, ग्रहणशीलता और मानसिक संस्कारों से जोड़ा जाता है।

चन्द्रमा की जन्मकालीन स्थिति से—


राशि + नक्षत्र + पाद

का निर्धारण होता है।

इसी लिए नाम का प्रारम्भिक स्वर नक्षत्र - पाद से जोड़ना केवल आधुनिक “लकी लेटर” की धारणा नहीं है।

यह एक पुरानी ज्योतिषीय नामकरण - परम्परा है।

27 नक्षत्र × 4 पाद = 108 पाद की यह व्यवस्था आज भी पारम्परिक नामकरण में उपयोग की जाती है।

गार्ग मुनि और श्रीकृष्ण का नाम ;


यहाँ एक महत्वपूर्ण शास्त्रीय उदाहरण मिलता है।

गर्ग परम्परा में नन्द के पुत्र का नामकरण गार्ग मुनि द्वारा किए जाने का वर्णन आता है।

नाम केवल सुविधा से नहीं रखा गया; 


नाम के अक्षरों और अर्थ की भी व्याख्या की गई।

गार्ग - संबंधी ग्रन्थ में नामकरण के लिए गार्ग मुनि को आमंत्रित करने का प्रसंग मिलता है।

इस उदाहरण से यह बात स्पष्ट होती है कि भारतीय परम्परा में नाम का अर्थ और नामकरण की विधि दोनों महत्वपूर्ण थे।

अर्थात् नाम केवल गणित नहीं था।

ऋग्वेद को नाम - अंकशास्त्र का प्रमाण बताना क्यों सावधानी मांगता है ?


ऋग्वेद अत्यन्त प्राचीन वैदिक संहिता है और उसमें मन्त्र, ऋषि, देवता तथा छन्द की व्यवस्थित परम्परा है। 

उपलब्ध ऋग्वेद - संहिता में लगभग 10,552 मन्त्र हैं और वह दस मण्डलों में व्यवस्थित है।

लेकिन आधुनिक English alphabet—

A=1, B=2, C=3—

वाली नाम - अंक गणना को सीधे ऋग्वेद का सिद्धान्त कहना प्रमाण की दृष्टि से उचित नहीं।

यह अन्तर बहुत महत्वपूर्ण है।

वैदिक मन्त्रशास्त्र में अक्षर और ध्वनि का महत्व है।

लेकिन इससे यह स्वतः सिद्ध नहीं होता कि आधुनिक alphabetic numerology की हर गणना ऋग्वेद में वर्णित है।

शास्त्रीय लेख लिखते समय प्रमाण और परम्परागत व्याख्या को अलग रखना ही सच्ची शास्त्रीयता है।

भविष्यपुराण, भृगुसंहिता और गर्गसंहिता का प्रयोग ;


भविष्यपुराण, भृगुसंहिता और गर्गसंहिता जैसे ग्रन्थों का नाम लेकर आज अनेक लोग हर आधुनिक numerology rule को “पुराण प्रमाणित” घोषित कर देते हैं।

यह पद्धति सावधानी योग्य है।

विशेष रूप से भविष्यपुराण की उपलब्ध पाण्डुलिपियों और संस्करणों में पर्याप्त पाठभेद और कालगत स्तरों की समस्या है, इस लिए किसी विशेष आधुनिक नियम को उसके नाम पर प्रमाणित करने से पहले मूल संस्कृत पाठ, अध्याय और श्लोक देना आवश्यक है।

इसी प्रकार गर्गसंहिता में नामकरण और श्रीकृष्ण के नाम से जुड़े प्रसंग मिलते हैं, पर उससे प्रत्येक आधुनिक name - number formula सिद्ध नहीं हो जाता।

इस लिए लेख में “पुराण में लिखा है” कहने के बजाय—


ग्रन्थ → अध्याय → श्लोक → मूल अर्थ → आधुनिक व्याख्या

यह क्रम रखना चाहिए।

नाम परिवर्तन कब विचार योग्य हो सकता है ?


शास्त्रीय एवं व्यावहारिक दृष्टि से नाम परिवर्तन पर विचार करने के कुछ आधार हो सकते हैं।

पहला — जन्म नक्षत्र से पूर्ण असंगति ;


यदि व्यक्ति स्वयं किसी नये नाम का उपयोग करना चाहता है, तो नया नाम जन्म नक्षत्र - पाद की परम्परागत ध्वनि से चुना जा सकता है।

दूसरा — अर्थ की समस्या ;


यदि नाम का अर्थ अपशब्द, नकारात्मक अर्थ या अपमानजनक अर्थ देता है, तो अर्थपूर्ण नाम अपनाना उचित हो सकता है।

तीसरा — उच्चारण ;


यदि नाम ऐसा है जिसे लोग लगातार गलत बोलते हैं और व्यक्ति स्वयं उससे असहज है, तो व्यवहारिक परिवर्तन लाभदायक हो सकता है।

चौथा — सामाजिक पहचान ;


व्यक्ति जीवन में वास्तविक रूप से जिस नाम से जाना जाता है, वही नाम उसके व्यवहारिक जीवन में अधिक महत्वपूर्ण हो सकता है।

पाँचवाँ — अंक-पद्धति ;


यदि कोई व्यक्ति numerology का अनुसरण करता है तो नामांक को मूलांक और भाग्यांक के साथ देखकर एक सहायक संकेत के रूप में उपयोग कर सकता है।

लेकिन इसे एकमात्र भाग्य-निर्णायक नियम नहीं बनाना चाहिए।

नाम परिवर्तन की सही ज्योतिषीय पद्धति ;


किसी व्यक्ति का नाम बदलना हो तो एक व्यवस्थित प्रक्रिया होनी चाहिए।

पहला चरण: जन्म समय की शुद्धता।

दूसरा चरण: लग्न एवं चन्द्र राशि।

तीसरा चरण: जन्म नक्षत्र एवं पाद।

चौथा चरण: नक्षत्र से प्राप्त नामाक्षर।

पाँचवाँ चरण: नाम का अर्थ।

छठा चरण: नाम की ध्वनि और उच्चारण।

सातवाँ चरण: मूलांक।

आठवाँ चरण: भाग्यांक।

नवाँ चरण: नामांक।

दसवाँ चरण: जन्मकुण्डली में संबंधित ग्रह की वास्तविक शक्ति।

ग्यारहवाँ चरण: वर्तमान महादशा-अन्तर्दशा।

बारहवाँ चरण: गोचर।

इस के बाद ही नाम परिवर्तन का निर्णय करना अधिक व्यवस्थित होगा।

क्या केवल spelling बदलना पर्याप्त है ?


यह आधुनिक numerology का बहुत लोकप्रिय विषय है।

उदाहरण—


नाम में एक “A” जोड़ना,

एक “H” बढ़ाना,

एक “Y” हटाना,

दो “N” करना,

या spelling को बदल देना।

इससे numerological calculation बदल सकती है।

लेकिन प्रश्न यह है—


क्या व्यक्ति वास्तव में नया नाम प्रयोग करता है?

यदि सरकारी कागजों में एक नाम है, परिवार दूसरा नाम बोलता है, मित्र तीसरा नाम बोलते हैं और सोशल मीडिया पर चौथा spelling है, तो व्यवहारिक रूप से कौन सा नाम व्यक्ति का “चलित नाम” माना जाए?

आधुनिक numerology में भी इस प्रश्न पर “जिस नाम से व्यक्ति वास्तव में पुकारा जाता है” को महत्व देने वाली पद्धतियाँ मिलती हैं।

इस लिए केवल कागज पर spelling बदलने से अधिक महत्वपूर्ण है—


नाम का वास्तविक, नियमित और स्थिर प्रयोग।
+++ +++

क्या नाम बदलने के बाद तुरन्त भाग्य बदलना चाहिए ?


ऐसा दावा नहीं करना चाहिए।

यदि कोई व्यक्ति नाम बदलता है और अगले दस दिनों में व्यापार में लाभ हो गया, तो यह अकेले नाम परिवर्तन का प्रमाण नहीं है।

उसी प्रकार नाम बदलने के बाद कोई समस्या आ गई तो यह भी स्वतः सिद्ध नहीं करता कि नया नाम अशुभ है।

ज्योतिष में समय का विचार आवश्यक है।

दशा + गोचर + जन्मयोग + पुरुषार्थ + परिस्थिति

इन सबको देखकर फल का मूल्यांकन किया जाना चाहिए।

नाम और कर्म का सम्बन्ध ;


भारतीय दर्शन में कर्म की भूमिका अत्यन्त महत्वपूर्ण है।

नाम व्यक्ति को पहचान देता है, लेकिन कर्म व्यक्ति का जीवन बनाते हैं।

एक व्यक्ति का नाम अत्यन्त शुभ हो सकता है लेकिन यदि वह अनुचित कर्म करे तो केवल नाम उसे कर्मफल से मुक्त नहीं कर देता।

इसी प्रकार किसी व्यक्ति का नाम सामान्य हो सकता है, लेकिन उसका पुरुषार्थ, ज्ञान, साधना, अनुशासन और सही समय पर सही निर्णय उसे जीवन में आगे ले जा सकता है।

इस लिए सही वाक्य यह नहीं है—

“नाम बदलो और नसीब बदल जाएगा।”

अधिक संतुलित वाक्य है—

“जन्मकुण्डली, नक्षत्र, नामध्वनि, अंक, कर्म और समय—

इन सभी को समझकर जीवन में उपलब्ध शुभ सम्भावनाओं का उचित उपयोग किया जा सकता है।”
+++ +++

अंकशास्त्र को कहाँ रखना चाहिए ?


अंकशास्त्र को पूर्णतः निरर्थक कहना भी उचित नहीं, और उसे सम्पूर्ण भाग्य का स्वामी बना देना भी उचित नहीं।

यदि कोई व्यक्ति अंकशास्त्र की परम्परा का पालन करता है तो वह इसे सहायक पद्धति की तरह प्रयोग कर सकता है।

उदाहरण:


जन्मांक → व्यक्ति की मूल प्रवृत्ति का संकेत

भाग्यांक → जीवन-पथ का संख्यात्मक संकेत

नामांक → प्रचलित नाम से संबंधित numerological संकेत

लेकिन उसके बाद—


कुण्डली → ग्रहबल → भाव → योग → दशा → गोचर

को देखना चाहिए।

यही समग्र पद्धति अधिक शास्त्रीय बनती है।

नाम बदलना “नसीब पर विजय” नहीं, “उपलब्ध सम्भावना का समायोजन” है


यह सबसे महत्वपूर्ण निष्कर्ष है।

जन्मकुण्डली को भाग्य का पूरा ताला और नाम को उसकी पूरी चाबी मान लेना गलत होगा।

नाम एक सहायक तत्व हो सकता है।

जैसे वास्तु में केवल मुख्य द्वार देखकर पूरा भवन निर्धारित नहीं किया जाता, वैसे ही केवल नामांक देखकर पूरा जीवन निर्धारित नहीं किया जा सकता।

वास्तु में दिशा, भूमि, आयाम, प्रवेश, ब्रह्मस्थान, उपयोग आदि देखे जाते हैं।

हस्तरेखा में केवल एक रेखा नहीं, बल्कि पर्वत, रेखाएँ, बनावट, रंग, शाखाएँ और चिन
हर हर महादेव जय मां अंबे मां !!!!! शुभमस्तु !!! 
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अंक ज्योतिष ( Numerology ) - अंकशास्त्र से नाम में परिवर्तन करके नसीब पर विजय प्राप्त करें ?

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