जानें हस्तरेखा से भविष्य ;
जानें हस्तरेखा से भविष्य - हथेली में राहु का स्थान
राहु का स्थान, भाग्य और जीवन में बदलाव के संकेत ;
हथेली में राहु का स्थान भाग्य और जीवन में बदलाव के देता है संकेत, जानें राहु पर्वत से जुड़ी खास बातें :
वैदिक ज्योतिष, खगोलीय नक्षत्र - पद्धति, कृष्णमूर्ति पद्धति तथा पुराण - परम्परा के आधार पर शास्त्रीय विवेचन ;
राहु अगर हथेली में पूर्ण रूप से उभरा हुआ हो, तो इसे बहुत अच्छा संकेत माना जाता है। इसका स्थान हथेली में मस्तिष्क रेखा से नीचे और तीन ग्रहों से घिरा हुआ होता है। हस्तरेखा विज्ञान के अनुसार, राहु पर्वत के उभार और स्थिति को देखकर किसी जातक के जीवन और भविष्य के बारे में कई खास बातें जानी जा सकती हैं।
Brass Made Shri Surya Yantra/Shri Sun Yantra/Siddh Surya Yantra fro Good Luck, Success and Prosperity from vrindavan 4 cms
| { Colour | Golden |
| Material | Brass |
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| Brand | Generic |
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{ About this item
- Material: Brass, Color: Multi, Finish: Other
- Package Contents: main unit
- Item Size: 8 cm x 8 cm x 8 cm
- Surya yantra can be very helpful for attaining peace prosperity and happiness
- It is considered to be the most powerful planet among all Nine planets }
भारतीय ज्योतिष - परम्परा में राहु को केवल अशुभ ग्रह मानकर उसका फल निर्धारित करना पूर्ण ज्योतिषीय दृष्टि नहीं है।
राहु वास्तव में छाया ग्रह है और जन्मकुंडली में उसकी स्थिति मनुष्य के जीवन में असामान्य अनुभव, अचानक परिवर्तन, भौतिक आकांक्षा, भ्रम, महत्वाकांक्षा, विदेशी अथवा अपरिचित क्षेत्र से संबंध और स्थापित व्यवस्था से अलग दिशा में जाने की प्रवृत्ति के संकेत दे सकती है।
राहु को छाया ग्रह माना जाता है, जिसकी स्थिति मजबूत होने पर यह जातक को भाग्यवान बना सकता है।
साथ ही, करियर, व्यापार और तकनीकी क्षेत्र में भी उन्नति दिला सकता है।
वहीं, अगर राहु की स्थिति कमजोर हो तो इससे जीवन में अचानक बदलाव, भ्रम आदि समस्याओं का सामना करना पड़ सकता है।
हस्तरेखा विज्ञान के अनुसार, राहु पर्वत की स्थिति और इसके उभार को देखकर किसी मनुष्य के जीवन और भविष्य के बारे में कई खास बातें जानी जा सकती हैं।
उभरा हुआ और उन्नत पर्वत शुभ संकेत देता है।
साथ ही, इस पर्वत से स्पष्ट और गहरी भाग्य रेखा आगे बढ़ रही हो तो इसे भी लाभदायी संकेत माना गया है।
आइए विस्तार से जानें राहु ग्रह हथेली में किस स्थान पर होता है और इसकी स्थिति के अनुसार व्यक्ति को जीवन में क्या फल मिलते हैं।
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हथेली में राहु का स्थान ;
हस्तरेखा विज्ञान के अनुसार, हथेली में राहु पर्वत मस्तिष्क रेखा से नीचे मंगल, शुक्र और चंद्रमा यानी तीन ग्रहों से घिरा हुआ स्थान होता है।
साथ ही, इसी पर्वत से होते हुए भाग्य रेखा शनि पर्वत की ओर आगे बढ़ती है।
यह जीवन में भाग्य, संघर्ष, अचानक होने वाले बदलाव और तरक्की से जुड़े कई शुभ - अशुभ संकेत देता है।
जिस प्रकार ज्योतिषशास्त्र में किसी व्यक्ति की कुंडली में राहु की स्थिति को देखकर भविष्यवाणी की जाती है, ठीक उसी प्रकार हथेली में राहु की स्थिति और स्थान को देखकर तकनीकी क्षेत्र, अप्रत्याशित बदलाव, इच्छाओं और भविष्य में होने वाली घटनाओं के बारे में जाना जाता है।
राहु का फल समझने के लिए केवल यह देखना पर्याप्त नहीं कि राहु किस भाव में बैठा है।
उसके साथ राशि, नक्षत्र, नक्षत्र स्वामी, भावेश, युति, दृष्टि, दशा - अन्तर्दशा और संबंधित भावों का संबंध देखना आवश्यक है।
यही कारण है कि एक ही भाव में स्थित राहु अलग - अलग जन्मकुंडलियों में अलग परिणाम दे सकता है।
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हथेली में राहु पर्वत देता है कई बड़े संकेत :
हस्तरेखा विज्ञान के मुताबिक, अगर हथेली में राहु पर्वत पूर्ण रूप से विकसित और स्पष्ट हो, तो इसे शुभ माना गया है।
यह संकेत देता है कि ऐसा व्यक्ति जीवन में भाग्यवान होता है।
करियर के क्षेत्र में भाग्य का साथ मिल सकता है और साथ ही, जीवन भी सुखद बना रहता है।
हथेली पर यदि राहु पर्वत पूर्ण रूप से विकसित हो लेकिन भाग्य रेखा टूटी हुई हो, तो इसे अच्छा संकेत नहीं माना जाता है।
हस्तरेखा विज्ञान के अनुसार, ऐसा जातक जीवन में आर्थिक क्षेत्र में अचानक बड़ी सफलता प्राप्त कर सकता है।
लेकिन फिर साथ ही, अचानक अप्रत्याशित रूप से आर्थिक स्थिति में बदलाव आ सकता है।
अगर राहु पर्वत पूर्ण रूप से विकसित हो और उसपर से होकर साफ व गहरी भाग्य रेखा आगे बढ़ती हो, तो इसे बेहद उत्तम माना जाता है।
कहते हैं कि ऐसा जातक अपने जीवन में निस्वार्थ भाव से दूसरों की मदद करने वाला होता है।
हर किसी के लिए इनके मन में अच्छी भावना होती है।
साथ ही, ऐसे जातक प्रतिभावान और धार्मिक होते हैं।
इन्हें जीवन में हर प्रकार के सुख प्राप्त हो सकते हैं।
हस्तरेखा विज्ञान के अनुसार, अगर राहु पर्वत अपने स्थान पर होने की बजाए हथेली के मध्य भाग की ओर सरका हुआ हो, तो इसे अच्छा संकेत नहीं माना जाता है।
ऐसे व्यक्ति को अपने युवा काल में परेशानियों का सामना करना पड़ सकता है।
इन्हें कोई भी कदम सोच - समझकर लेने की आवश्यकता होती है।
कहा जाता है कि अगर पूर्ण रूप से विकसित न हो यानी कम उभरा हुआ हो, तो ऐसे व्यक्ति स्वभाव से चंचल हो सकते हैं।
ऐसे में इन्हें आर्थिक और संपत्ति संबंधी मामलों में अधिक सजग रहने की जरूरत होती है।
छोटी सी गलती भी बड़ा नुकसान का कारण बन सकती है।
ऐसे में इनके लिए सावधानी से फैसले लेना जरूरी माना गया है।
भारतीय परम्परा में राहु को ग्रहों की सामान्य श्रेणी से अलग माना गया है।
सूर्य और चंद्रमा के मार्गों के प्रतिच्छेदन से बनने वाले उत्तरायण बिंदु को राहु तथा दक्षिणायण बिंदु को केतु कहा जाता है।
इस लिए राहु का संबंध आकाशीय गति के उस बिंदु से है जहाँ ग्रहण की घटना संभव होती है।
इसी कारण भारतीय ज्योतिष में राहु को ग्रहण, आवरण और असामान्य परिवर्तन से जोड़ा गया है।
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राहु का मूल स्वभाव ;
राहु का सबसे महत्वपूर्ण स्वभाव है—
सीमा तोड़कर प्राप्त करने की इच्छा।
जहाँ राहु बैठता है वहाँ व्यक्ति के भीतर उस क्षेत्र के प्रति तीव्र आकर्षण पैदा हो सकता है।
वह सामान्य उपलब्धि से संतुष्ट न होकर कुछ अलग, बड़ा अथवा असामान्य प्राप्त करना चाहता है।
राहु के फल में मुख्य रूप से निम्न तत्व देखे जाते हैं—
- अचानक परिवर्तन
- अत्यधिक महत्वाकांक्षा
- भौतिक उपलब्धि की तीव्र इच्छा
- अपरंपरागत मार्ग
- विदेश अथवा दूरस्थ स्थान से संबंध
- नई तकनीक या नवीन साधनों का उपयोग
- भ्रम तथा गलत आकलन
- अचानक लाभ अथवा अचानक हानि
- सामाजिक प्रतिष्ठा में असामान्य उतार-चढ़ाव
- ऐसी परिस्थितियाँ जिनमें पुरानी जीवन-व्यवस्था बदल जाती है
लेकिन इन सभी परिणामों को निश्चित भविष्यवाणी नहीं माना जाना चाहिए।
कुंडली में राहु को शुभ ग्रहों का सहयोग हो तो वही राहु असाधारण सफलता का साधन बन सकता है; दुर्बल या पीड़ित स्थिति में वही राहु भ्रम और अव्यवस्था बढ़ा सकता है।
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राहु और भाग्य :
भाग्य का विचार मुख्यतः नवम भाव, नवमेश, गुरु तथा उनसे संबंधित ग्रहों से किया जाता है।
इस लिए केवल राहु को देखकर भाग्य का निर्णय करना शास्त्रीय दृष्टि से उचित नहीं है।
यदि राहु का संबंध नवम भाव या नवमेश से बने, तो भाग्य का मार्ग सामान्य ढंग से न चलकर असामान्य परिस्थितियों से खुल सकता है।
व्यक्ति को ऐसी जगह, कार्य, विचारधारा या अवसर से लाभ मिल सकता है जिसकी उसने पहले कल्पना नहीं की हो।
यदि नवम भाव मजबूत हो और राहु उससे संबंधित होकर शुभ ग्रहों के प्रभाव में हो, तो राहु व्यक्ति को परंपरागत सीमा से बाहर जाकर अवसर प्राप्त करने की क्षमता दे सकता है।
इसके विपरीत यदि नवम भाव और नवमेश गंभीर रूप से पीड़ित हों और राहु भी अशुभ संबंध में हो, तो भाग्य के विषय में भ्रम, गलत निर्णय, गुरुजनों से मतभेद या अवसर मिलने के बाद उनका सही उपयोग न कर पाने की स्थिति बन सकती है।
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इस लिए नियम स्पष्ट है—
राहु भाग्य को अकेले नहीं बनाता; वह भाग्य के मार्ग को असामान्य, अप्रत्याशित या परिवर्तनीय बना सकता है।
राहु की सबसे विशेष पहचान जीवन में अचानक मोड़ देने वाले अनुभवों से की जाती है।
यदि राहु किसी महत्वपूर्ण भाव, भावेश, लग्नेश, दशमेश, नवमेश या चंद्रमा से मजबूत संबंध बनाता है, तो उसकी दशा - अन्तर्दशा में जीवन की दिशा बदलने वाली घटनाएँ दिखाई दे सकती हैं।
ऐसे परिवर्तन हमेशा नकारात्मक नहीं होते।
नौकरी बदलना, व्यवसाय की दिशा बदलना, नए क्षेत्र में प्रवेश, दूरस्थ स्थान जाना, तकनीकी क्षेत्र से जुड़ना, नई सामाजिक पहचान बनना, अचानक प्रसिद्धि मिलना या पुरानी व्यवस्था छोड़कर नई व्यवस्था अपनाना—
ये सभी राहु के परिवर्तनकारी स्वभाव के संभावित रूप हो सकते हैं।
इसी प्रकार अचानक बने अवसर भी राहु के फल में आ सकते हैं।
लेकिन राहु की प्रकृति में स्थिरता से अधिक तीव्र इच्छा और परिवर्तन होता है।
इस लिए अवसर मिलने पर विवेक का उपयोग आवश्यक है।
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राहु बारह भावों में ;
प्रथम भाव ;
लग्न में राहु होने पर व्यक्तित्व सामान्य ढाँचे से अलग दिखाई दे सकता है।
व्यक्ति में स्वयं को अलग पहचान देने की इच्छा हो सकती है।
महत्वाकांक्षा बढ़ सकती है।
यदि लग्नेश मजबूत हो और राहु शुभ संबंध में हो तो यह स्थिति असाधारण व्यक्तित्व और प्रभाव उत्पन्न कर सकती है।
पीड़ित स्थिति में मानसिक अस्थिरता, भ्रम या स्वयं के संबंध में गलत धारणा बढ़ सकती है।
द्वितीय भाव ;
द्वितीय भाव धन, वाणी, परिवार तथा संचित संपत्ति से संबंधित है।
राहु यहाँ धन प्राप्ति की तीव्र इच्छा दे सकता है और वाणी को प्रभावशाली या असामान्य बना सकता है।
लेकिन धन के मामले में राहु के कारण जल्दबाजी या अत्यधिक जोखिम लेने की प्रवृत्ति हो सकती है।
इस लिए धन का निर्णय केवल राहु देखकर नहीं करना चाहिए।
तृतीय भाव ;
तृतीय भाव साहस, पराक्रम, संचार, छोटे भाई - बहन तथा प्रयास का है।
यहाँ राहु व्यक्ति को जोखिम उठाने, प्रचार, संचार, लेखन, तकनीक अथवा नए साधनों के प्रयोग की ओर ले जा सकता है।
मजबूत स्थिति में यह साहस और प्रतिस्पर्धात्मक क्षमता बढ़ा सकता है।
चतुर्थ भाव ;
चतुर्थ भाव माता, गृह, भूमि, वाहन और मानसिक सुख से संबंधित है।
राहु यहाँ घर - परिवार या संपत्ति के विषय में असामान्य परिस्थितियाँ उत्पन्न कर सकता है।
घर बदलना, अलग स्थान पर रहना, आधुनिक अथवा अपरंपरागत संपत्ति से संबंध बनना जैसे परिणाम संभव हो सकते हैं।
परंतु मानसिक शांति के विषय में अन्य ग्रहों का बल देखना आवश्यक है।
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पंचम भाव ;
पंचम भाव बुद्धि, शिक्षा, संतान, रचनात्मकता और पूर्व पुण्य से संबंधित है।
राहु यहाँ असामान्य ज्ञान, नई विचारधारा, तकनीकी विषय या अलग प्रकार की रचनात्मक क्षमता दे सकता है।
लेकिन निर्णय क्षमता में भ्रम अथवा अत्यधिक कल्पना भी संभव है।
इस लिए पंचम भाव में राहु का फल गुरु, बुध और पंचमेश की स्थिति से विशेष रूप से देखना चाहिए।
षष्ठ भाव ;
षष्ठ भाव रोग, ऋण, शत्रु, सेवा और संघर्ष से संबंधित है।
परंपरागत ज्योतिष में राहु को यहाँ कई परिस्थितियों में संघर्ष पर विजय पाने की क्षमता देने वाला माना गया है।
व्यक्ति कठिन परिस्थितियों से निकलने में सक्षम हो सकता है।
प्रतिस्पर्धा और विरोध की स्थिति में असामान्य रणनीति अपनाने की क्षमता भी दिखाई दे सकती है।
सप्तम भाव ;
सप्तम भाव विवाह, साझेदारी, व्यापारिक संबंध और सार्वजनिक व्यवहार का है।
राहु यहाँ संबंधों में असामान्य आकर्षण या अलग पृष्ठभूमि के व्यक्ति से संबंध की संभावना बढ़ा सकता है।
व्यापारिक साझेदारी में भी अचानक अवसर आ सकते हैं, लेकिन अत्यधिक अपेक्षा और भ्रम से बचना आवश्यक है।
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अष्टम भाव ;
अष्टम भाव अचानक परिवर्तन, गुप्त विषय, आयु, शोध, उत्तराधिकार और गहन परिवर्तन से संबंधित है।
राहु यहाँ जीवन के गहरे और रहस्यमय पक्षों की ओर आकर्षण दे सकता है।
शोध, गूढ़ विषय, रहस्य और अचानक परिवर्तन इसके प्रमुख संकेत हो सकते हैं।
परंतु इस भाव का फल अत्यंत सूक्ष्म है और केवल राहु देखकर निष्कर्ष निकालना उचित नहीं।
नवम भाव ;
नवम भाव धर्म, गुरु, भाग्य, उच्च ज्ञान, लंबी यात्राएँ और जीवन - दर्शन का है।
राहु यहाँ परंपरागत सोच से अलग ज्ञान या दर्शन की खोज करा सकता है।
भाग्य में अचानक मोड़ आ सकते हैं।
विदेशी या अपरिचित विचारधारा से संपर्क भी संभव है।
किंतु धर्म और गुरु के विषय में विवेक आवश्यक है, क्योंकि राहु सत्य की खोज के साथ भ्रम भी उत्पन्न कर सकता है।
दशम भाव ;
दशम भाव कर्म, व्यवसाय, प्रतिष्ठा और सामाजिक स्थिति का प्रमुख भाव है।
राहु की यहाँ स्थिति विशेष महत्व रखती है।
यदि दशमेश, लग्नेश और अन्य कर्म - संबंधी ग्रह मजबूत हों, तो राहु व्यक्ति को बड़े स्तर पर पहचान, असामान्य व्यवसाय, तकनीकी क्षेत्र, जनसंपर्क या ऐसी गतिविधियों में आगे बढ़ा सकता है जो सामान्य व्यवसाय से अलग हों।
लेकिन राहु की प्रकृति के कारण प्रतिष्ठा में अचानक उतार - चढ़ाव भी संभव है।
इस लिए कर्मक्षेत्र में नैतिकता और पारदर्शिता अत्यंत महत्वपूर्ण है।
एकादश भाव ;
एकादश भाव लाभ, आय, मित्र, नेटवर्क और इच्छापूर्ति का है।
राहु यहाँ बड़ी इच्छाएँ और बड़े नेटवर्क की आकांक्षा उत्पन्न कर सकता है।
मजबूत योग होने पर बड़े स्तर पर लाभ अथवा प्रभावशाली संपर्क मिल सकते हैं।
लेकिन लालच और आवश्यकता से अधिक अपेक्षा से बचना चाहिए।
द्वादश भाव ;
द्वादश भाव व्यय, विदेश, एकांत, निद्रा, त्याग और दूरस्थ स्थानों का है।
राहु यहाँ विदेशी संबंध, दूरस्थ स्थान, डिजिटल अथवा अदृश्य माध्यमों से संपर्क और असामान्य व्यय के संकेत दे सकता है।
यदि अन्य ग्रह विदेश या आध्यात्मिकता का समर्थन करें तो यह स्थिति जीवन को बिल्कुल अलग दिशा में ले जा सकती है।
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नक्षत्र - पद्धति में राहु के फल को समझने के लिए यह देखना आवश्यक है कि राहु किस नक्षत्र में स्थित है और उस नक्षत्र का स्वामी कौन है।
राहु स्वयं जिस भाव में स्थित है उसका संकेत देता है, लेकिन नक्षत्र स्वामी के माध्यम से फल का क्षेत्र और अधिक स्पष्ट हो सकता है।
उदाहरण के लिए यदि राहु किसी ऐसे नक्षत्र में हो जिसका स्वामी दशम भाव से संबंधित हो, तो राहु की दशा में कर्मक्षेत्र प्रमुख हो सकता है।
यदि वही नक्षत्र स्वामी नवम भाव से संबंधित हो तो भाग्य, उच्च शिक्षा, गुरु या दूरस्थ यात्रा जैसे विषय सक्रिय हो सकते हैं।
इसी सिद्धांत को कृष्णमूर्ति पद्धति में और अधिक सूक्ष्म रूप से देखा जाता है।
वहाँ राहु - केतु के फल में उनके नक्षत्र स्वामी और सब - लॉर्ड का विशेष महत्व माना जाता है।
अतः राहु के फल का एक महत्वपूर्ण नियम है—
राहु की राशि से पहले उसके भाव, नक्षत्र स्वामी और संबंधित भावों की वास्तविक श्रृंखला को समझना चाहिए।
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राहु और अन्य ग्रह ;
राहु जिस ग्रह के साथ जुड़ता है, उसके सिद्धांतों को असामान्य ढंग से व्यक्त कर सकता है।
सूर्य के साथ संबंध होने पर प्रतिष्ठा, अधिकार और पहचान के विषय में तीव्र आकांक्षा हो सकती है।
चंद्रमा के साथ संबंध मन, भावनाओं और निर्णयों में असामान्य उतार-चढ़ाव दे सकता है।
मंगल के साथ राहु ऊर्जा, साहस और जोखिम लेने की प्रवृत्ति को बहुत बढ़ा सकता है।
बुध के साथ तकनीक, गणना, व्यापार, संचार और चतुराई का प्रभाव बढ़ सकता है।
गुरु के साथ संबंध ज्ञान और विस्तार की इच्छा बढ़ा सकता है, लेकिन गुरु की शुद्धता और बल के अनुसार परिणाम बदलता है।
शुक्र के साथ भौतिक सुख, आकर्षण, कला, विलासिता और संबंधों की इच्छाएँ तीव्र हो सकती हैं।
शनि के साथ राहु कर्म, संघर्ष, व्यवस्था-विरोध, श्रम और दीर्घकालिक दबाव को विशेष रूप से सक्रिय कर सकता है।
लेकिन किसी भी युति को स्वतः शुभ या अशुभ घोषित करना उचित नहीं है।
भाव, राशि, नक्षत्र, ग्रहबल और दशा का संयुक्त विचार आवश्यक है।
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राहु की दशा और जीवन का परिवर्तन ;
राहु की महादशा या अंतरदशा में जन्मकुंडली में उससे संबंधित भाव सक्रिय हो सकते हैं।
इस लिए राहु की दशा को केवल “अशुभ समय” कहना शास्त्रीय दृष्टि से अधूरा है।
यदि राहु लाभ, कर्म, पराक्रम या अन्य समर्थ भावों से संबंधित हो तो उसकी दशा जीवन में बड़े अवसर दे सकती है।
यदि वह ऋण, भ्रम, विवाद या अन्य कठिन विषयों से संबंधित हो तो उन्हीं क्षेत्रों में परीक्षा भी आ सकती है।
इसलिए राहु की दशा का वास्तविक प्रश्न यह नहीं है कि—
“राहु अच्छा है या बुरा?”
बल्कि यह है कि—
“राहु किस भाव का फल दे रहा है, किस ग्रह के माध्यम से दे रहा है और दशा में कौन से भाव सक्रिय हो रहे हैं?”
यही प्रश्न फलादेश को अधिक सटीक बनाता है।
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राहु और वास्तु ;
वास्तुशास्त्र और ज्योतिष अलग शास्त्रीय शाखाएँ हैं।
इस लिए जन्मकुंडली के राहु को सीधे किसी वास्तु - दोष का प्रमाण कहना उचित नहीं है।
फिर भी परंपरागत ज्योतिष - वास्तु विचार में यदि राहु से संबंधित जीवन - विषयों में लगातार बाधाएँ दिखाई दें तो निवास, कार्यस्थल, प्रकाश, स्वच्छता, अव्यवस्था तथा उपयोगहीन वस्तुओं की स्थिति की व्यावहारिक जाँच की जा सकती है।
वास्तु को राहु के हर फल का कारण मानना उचित नहीं है।
राहु और अंकशास्त्र, हस्तरेखा तथा सामुद्रिकशास्त्र ;
अंकशास्त्र, हस्तरेखा और सामुद्रिकशास्त्र अपनी - अपनी परंपराओं में अलग संकेत - पद्धतियाँ रखते हैं।
इन्हें वैदिक जन्मकुंडली का प्रत्यक्ष विकल्प नहीं माना जाना चाहिए।
हस्तरेखा में जीवन की घटनाओं के परिवर्तन को रेखाओं के परिवर्तन, शाखाओं, द्वीप, टूटन अथवा अन्य चिह्नों से परंपरागत रूप से देखा जाता है।
सामुद्रिकशास्त्र शरीर के लक्षणों से स्वभाव और जीवन - संकेतों का अध्ययन करता है।
यदि इन सभी पद्धतियों में एक ही विषय—
जैसे कर्म, धन, परिवर्तन या विदेश - संबंध—
के संकेत मिलें, तो पारंपरिक ज्योतिषीय अध्ययन में उसे सहायक संकेत के रूप में देखा जा सकता है;
लेकिन एक पद्धति के निष्कर्ष को दूसरी पद्धति का शास्त्रीय प्रमाण कहना उचित नहीं होगा।
पुराण - परम्परा में राहु का संकेत ;
पुराण - परम्परा में राहु की प्रसिद्ध कथा समुद्र - मंथन के प्रसंग से जुड़ी है, जहाँ राहु देवताओं के बीच बैठकर अमृत प्राप्त करने का प्रयास करता है और सूर्य तथा चंद्रमा के संकेत से उसका भेद खुलता है।
भगवान विष्णु के सुदर्शन से उसका मस्तक अलग होता है और अमृत - स्पर्श के कारण उसका सिर राहु तथा धड़ केतु के रूप में प्रतिष्ठित माना जाता है।
इस कथा का ज्योतिषीय प्रतीकात्मक अर्थ अत्यंत गहरा है—
राहु सीमाओं को पार करके उस वस्तु को प्राप्त करना चाहता है जो उसके सामान्य अधिकार - क्षेत्र में नहीं है।
इसी लिए राहु को इच्छा, महत्वाकांक्षा, छल, सीमा - भंग और असामान्य प्राप्ति से जोड़ा जाता है।
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अंतिम शास्त्रीय नियम ;
राहु के फलादेश में निम्न क्रम सबसे अधिक उपयोगी है—
पहला—राहु किस भाव में है।
दूसरा—किस राशि में है।
तीसरा—किस नक्षत्र में है और नक्षत्र स्वामी कहाँ स्थित है।
चौथा—राहु किन ग्रहों से युति या संबंध बना रहा है।
पाँचवाँ—राहु से संबंधित भावों के स्वामी कितने मजबूत हैं।
छठा—दशा और अंतरदशा में कौन से भाव सक्रिय हो रहे हैं।
सातवाँ—गोचर उस समय जन्मकुंडली के किन महत्वपूर्ण बिंदुओं को सक्रिय कर रहा है।
और अंत में पूरे जन्मकुंडली-चक्र को देखकर ही निष्कर्ष देना चाहिए।
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निष्कर्ष ;
राहु को केवल भय का ग्रह मानना उसकी प्रकृति को बहुत छोटा कर देना है।
राहु परिवर्तन का संकेतक, असामान्य इच्छा का प्रतिनिधि और स्थापित सीमा से बाहर जाने की प्रवृत्ति का द्योतक हो सकता है।
जहाँ राहु बैठता है, वहाँ मनुष्य सामान्य से अधिक पाने की इच्छा कर सकता है।
यदि विवेक, शुभ ग्रहबल और उचित कर्म का सहयोग हो तो यही तीव्र इच्छा असाधारण उपलब्धि का कारण बन सकती है।
यदि विवेक कमजोर हो तो वही इच्छा भ्रम, जल्दबाजी और गलत दिशा में ले जा सकती है।
इस लिए राहु का वास्तविक संदेश भय नहीं, बल्कि विवेकपूर्ण परिवर्तन है।
राहु जीवन में प्रश्न उठाता है—
“जो अभी तक नहीं मिला, उसे पाने के लिए क्या नई दिशा अपनानी चाहिए ?”
ज्योतिष का उत्तर यह है कि नई दिशा अपनाना अपने आप में गलत नहीं है; लेकिन राहु की तीव्र इच्छा के साथ ग्रहबल, भावफल, नक्षत्र, दशा, कर्म और विवेक का परीक्षण अनिवार्य है।
इसी संयुक्त दृष्टि से राहु को समझने पर उसके द्वारा दिए जाने वाले भाग्य - परिवर्तन और जीवन के बड़े मोड़ों का अध्ययन अधिक संतुलित, शास्त्रीय और सटीक बनता है।
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