|| जानें हस्तरेखा से भविष्य||
गुरु पर्वत पर क्रॉस ;
जाने गुरु पर्वत के चिन्हों, रेखाओं और उनके प्रभाव का शास्त्रीय रहस्य ;
गुरु पर्वत पर क्रॉस, त्रिभुज समेत ये निशान होते हैं बेहद खास, जानें गुरु पर्वत के चिह्नों से जुड़ी खास बातें !
भारतीय ज्योतिष और सामुद्रिक परंपरा में गुरु अर्थात बृहस्पति को ज्ञान, धर्म, सदाचार, गुरु - कृपा, विद्या, संतान, विवाह, सम्मान, न्याय, आध्यात्मिकता और जीवन में उचित मार्गदर्शन देने वाला ग्रह माना गया है।
जन्मकुंडली में बृहस्पति की स्थिति का अध्ययन वैदिक ज्योतिष का महत्वपूर्ण अंग है, जबकि हथेली में तर्जनी अंगुली के नीचे स्थित उभरे हुए क्षेत्र को हस्तरेखा एवं सामुद्रिक परंपरा में गुरु पर्वत कहा जाता है।
गुरु पर्वत हथेली में तर्जनी उंगली के ठीक नीचे और जीवन रेखा के ऊपर मौजूद होता है।
इस के उभार को देखकर किसी व्यक्ति के जीवन और भविष्य से जुड़े संकेत जाने जाते हैं।
वहीं, पर्वत पर मौजूद त्रिभुज, क्रॉस आदि निशान भी हमें कई प्रकार के संकेत देते हैं।
आइए विस्तार से जानें गुरु पर्वत पर मौजूद निशानों से जुड़े खास संकेत।
Hawai 24k Gold Plated Small Size Subh Swastik Kalash for Home Business Place Decoration Use 8.5x6cm SFDI227
https://amzn.to/4fVUIBo
- { Gold Plated Photo Sticker
- Made up of High Quality Plastic Material
- Water Proof and Rust Proof
- Self Adhesive Sticker
- Best Gift Item for your near and dear ones }
यहाँ एक महत्वपूर्ण बात समझना आवश्यक है कि जन्मकुंडली का बृहस्पति और हथेली का गुरु पर्वत एक ही शास्त्रीय पद्धति के दो समान प्रमाण नहीं हैं।
वैदिक ज्योतिष में ग्रहों की राशि, भाव, दृष्टि, युति, नवांश, दशा और गोचर आदि से फलादेश किया जाता है।
इसके विपरीत हस्तरेखा - सामुद्रिक परंपरा में पर्वत, रेखाएँ, चिह्न, अंगुलियों की बनावट और हथेली की संरचना देखकर पारंपरिक संकेतों का विवेचन किया जाता है।
हस्तरेखा विज्ञान के अनुसार, हथेली पर मौजूद पर्वतों को देखते समय उन पर मौजूद रेखाओं और निशानों पर भी जरूर ध्यान देना चाहिए।
क्योंकि ये चिह्न हमें हमारे जीवन से जुड़ी कई खास बातें बताती हैं।
पर्वत पर त्रिभुज, क्रॉस समेत कई निशानों को बहुत खास माना गया है।
इन से अपने भविष्य से जुड़े कुछ संकेतों को जाना जा सकता है।
आज हम गुरु पर्वत के निशानों को जानेंगे कि इस पर्वत पर कौन - सा निशान होने से उसका क्या फल मिलता है।
हस्तरेखा विज्ञान के अनुसार, गुरु पर्वत पर क्रॉस का चिह्न होना बेहद शुभ माना जाता है।
आइए विस्तार से जानें गुरु पर्वत के निशानों से जुड़ी खास बातें।
इसलिए गुरु पर्वत पर बना कोई त्रिभुज देखकर अकेले यह घोषित करना उचित नहीं कि व्यक्ति के जीवन में निश्चित रूप से अमुक घटना होगी।
फलादेश में संपूर्ण हथेली तथा जन्मकुंडली को साथ देखकर निष्कर्ष निकालना अधिक उचित माना जाता है।
गुरु पर्वत कहाँ होता है ?
हथेली में तर्जनी अंगुली अर्थात प्रथम अंगुली के ठीक नीचे का उभरा हुआ भाग गुरु पर्वत कहलाता है।
इसका संबंध पारंपरिक हस्तरेखा - विवेचन में गुरु के गुणों से जोड़ा जाता है।
गुरु पर्वत का अध्ययन करते समय मुख्यतः ये बातें देखी जाती हैं—
1. पर्वत उन्नत है या दबा हुआ।
2. पर्वत अत्यधिक उभरा हुआ है या संतुलित।
3. पर्वत पर कौन - सी प्रमुख रेखाएँ आती हैं।
4. कोई त्रिभुज, वर्ग, तारा, क्रॉस, जाल अथवा अन्य चिह्न दिखाई देता है या नहीं।
5. तर्जनी अंगुली का आकार कैसा है।
6. जीवनरेखा, मस्तिष्करेखा, हृदयरेखा और भाग्यरेखा की स्थिति कैसी है।
7. दूसरी हथेली में भी समान संकेत हैं या नहीं।
पारंपरिक मान्यता में संतुलित गुरु पर्वत को नेतृत्व, आत्मसम्मान, ज्ञान और मार्गदर्शन की प्रवृत्ति से जोड़ा जाता है।
गुरु पर्वत पर एक से अधिक रेखाएं होना :
गुरु ग्रह हथेली में तर्जनी उंगली के ठीक नीचे और जीवन रेखा के ऊपर उभरा हुआ स्थान होता है।
मान्यता है कि अगर गुरु पर्वत के ऊपर एक से अधिक रेखाएं दिखाई देती हों, तो इसे भाग्योदय का संकेत माना जाता है।
ऐसे जातक नवीन कार्यों में अधिक रुचि लेने वाले हो सकते हैं।
गुरु पर्वत पर त्रिभुज का संकेत ;
हस्तरेखा की परंपरा में त्रिभुज को विशेष चिह्नों में गिना जाता है।
गुरु पर्वत पर स्पष्ट और अच्छी तरह बनी हुई त्रिकोणीय आकृति को कुछ हस्तरेखा परंपराएँ ज्ञान, विवेक, संगठन क्षमता, नेतृत्व तथा आध्यात्मिक या विद्या संबंधी रुचि से जोड़ती हैं।
लेकिन त्रिभुज वास्तव में त्रिभुज है या केवल तीन रेखाओं के मिलने से बनी आकस्मिक आकृति—
यह बहुत महत्वपूर्ण है।
यदि त्रिभुज—
- स्पष्ट हो,
- बंद हो,
- रेखाएँ गहरी हों,
- आसपास अनावश्यक जाल न हो,
- और गुरु पर्वत संतुलित हो,
तो पारंपरिक हस्तरेखा-विवेचन में इसे अपेक्षाकृत शुभ संकेत माना जाता है।
ऐसे संकेत वाले व्यक्ति में शिक्षा, मार्गदर्शन, प्रशासन, नेतृत्व, अध्यापन अथवा धार्मिक - अध्यात्मिक विषयों में रुचि की संभावना बताई जाती है।
लेकिन इसे निश्चित भविष्यवाणी नहीं समझना चाहिए।
गुरु पर्वत पर त्रिभुज का निशान ;
हस्तरेखा विज्ञान के अनुसार, यदि गुरु पर्वत पर त्रिभुज का निशान बन रहा हो, तो इसे एक उत्तम संकेत माना जाता है।
ऐसे में अगर आप राजनीतिक कार्यों से जुड़े हैं, तो उसमें सफलता मिलने के योग बन सकते हैं।
क्योंकि इस निशान को धार्मिक व राजनीतिक कार्यों में सफलता का संकेत माना जाता है।
गुरु पर्वत पर एक रेखा का निशान :
अगर किसी व्यक्ति की हथेली में गुरु पर्वत पर एक रेखा का निशान मौजूद हो, तो इसे बहुत शुभ संकेत माना जाता है।
हस्तरेखा विज्ञान के अनुसार, यह कार्यों में सफलता प्राप्त होने की ओर इशारा कर सकता है।
+++
+++
गुरु पर्वत पर क्रॉस का निशान बनना ;
हस्तरेखा विज्ञान में गुरु पर्वत पर क्रॉस का निशान होना बहुत अच्छा माना गया है।
यह चिह्न वैवाहिक जीवन से जुड़े संकेत देता है।
मान्यता है कि क्रॉस का निशान दांपत्य जीवन में पूर्णता और घर में मांगलिक कार्यों का संकेत होता है।
ऐसे लोगों का वैवाहिक जीवन सुखद बना रह सकता है।
गुरु पर्वत पर आपस में कटती हुई रेखाएं;
अगर किसी मनुष्य की हथेली में गुरु पर्वत पर आपस में कटती हुई रेखाएं हो, तो इसे अच्छा संकेत नहीं माना जाता है।
मान्यता है कि ऐसी स्थिति में जीवन में परेशानियां आने के आशंका रहती है।
साथ ही, कार्यों में बाधाएं या देरी जैसी समस्याओं का सामना भी हो सकता है।
गुरु पर्वत पर तारा :
गुरु पर्वत पर स्पष्ट तारा भी पारंपरिक हस्तरेखा में महत्वपूर्ण चिह्न माना जाता है।
तारे में सामान्यतः कई छोटी रेखाएँ एक केंद्र पर मिलती दिखाई देती हैं।
परंपरागत व्याख्या में गुरु पर्वत का स्पष्ट तारा प्रतिष्ठा, नेतृत्व, सम्मान या प्रभावशाली उपलब्धि से जोड़ा गया है।
लेकिन यदि तारे जैसी आकृति वास्तव में बहुत - सी अव्यवस्थित रेखाओं का समूह है, तो उसका अर्थ अलग हो सकता है।
इस लिए केवल दूर से देखकर चिह्न का निर्णय नहीं करना चाहिए।
गुरु पर्वत पर नक्षत्र का निशान ;
हस्तरेखा विज्ञान के अनुसार, अगर हथेली में गुरु पर्वत पर नक्षत्र या स्टार का निशान बनता हो, तो इसे बेहद शुभ संकेत माना जाता है।
मान्यता है कि यह निशान जीवन में महत्वाकांक्षाओं के पूरा होने का संकेत देता है।
साथ ही, ऐसे जातक ऊंचे सपने देखते हैं और उन्हें अपनी मेहनत से पूरा करने का साहस भी रखते हैं।
+++
+++
गुरु पर्वत और बृहस्पति का ज्योतिषीय संबंध ;
वैदिक ज्योतिष में बृहस्पति को देवगुरु कहा गया है।
गुरु का संबंध ज्ञान, धर्म, वेद-वेदांग, सदाचार, मंत्रविद्या, न्याय, संतान, विवाह, धन, सम्मान और आध्यात्मिक मार्गदर्शन जैसे विषयों से जोड़ा जाता है।
जन्मकुंडली में बृहस्पति का विचार करते समय केवल यह नहीं देखा जाता कि गुरु किस राशि में है।
उसके साथ निम्न बातों का विचार भी आवश्यक है—
राशि, भाव, भावेशत्व, ग्रहों की युति, ग्रहदृष्टि, नक्षत्र, नवांश, षड्बल, दशा - अंतरदशा और गोचर।
कृष्णमूर्ति पद्धति में भी किसी घटना के फलादेश के लिए केवल गुरु ग्रह को देखकर निर्णय नहीं किया जाता, बल्कि संबंधित भावों, नक्षत्र स्वामी और उपस्वामी आदि का सूक्ष्म विचार किया जाता है।
अतः यदि किसी व्यक्ति की हथेली में गुरु पर्वत सुंदर दिखाई देता है लेकिन जन्मकुंडली में गुरु अत्यंत निर्बल है, तो दोनों संकेतों को अलग - अलग समझना चाहिए।
इसी प्रकार कुंडली में गुरु बलवान हो लेकिन हथेली पर गुरु पर्वत सामान्य हो, तो हस्तरेखा के संकेत को स्वतंत्र पारंपरिक संकेत के रूप में देखना चाहिए।
+++
+++
गुरु पर्वत पर क्रॉस या चतुष्कोण ;
गुरु पर्वत पर क्रॉस की व्याख्या परंपरागत हस्तरेखा में परिस्थिति के अनुसार अलग - अलग की जाती है।
स्पष्ट क्रॉस और अनेक कटती हुई रेखाओं के जाल में अंतर करना आवश्यक है।
वहीं वर्ग या चतुष्कोण को कई हस्तरेखा परंपराएँ संरक्षण अथवा सुरक्षा के संकेत के रूप में देखती हैं।
इसका फल निर्धारित करने के लिए यह देखना आवश्यक है कि वह आकृति स्वतंत्र रूप से बनी है अथवा किसी प्रमुख रेखा के टूटने या कटने से बनी है।
गुरु पर्वत पर जाल जैसी रेखाएँ ;
यदि गुरु पर्वत पर बहुत-सी बारीक रेखाएँ एक - दूसरे को काटती हुई दिखाई दें तो इसे सामान्यतः जाल कहा जाता है।
पारंपरिक हस्तरेखा मत में अत्यधिक जाल को गुरु के सकारात्मक गुणों में बिखराव, मानसिक उलझन, महत्वाकांक्षा में अस्थिरता या नेतृत्व के प्रति तनाव से जोड़ा जा सकता है।
ऐसे व्यक्ति के लिए परंपरागत सलाह होती है कि वह अपनी ऊर्जा को अनेक दिशाओं में फैलाने के बजाय एक स्पष्ट लक्ष्य पर केंद्रित करे।
+++
+++
गुरु पर्वत से निकलने वाली रेखाएँ :
गुरु पर्वत पर दिखाई देने वाली ऊर्ध्व रेखाएँ भी हस्तरेखा - विवेचन में देखी जाती हैं।
एक साफ और ऊपर की ओर जाती रेखा को परंपरागत रूप से महत्वाकांक्षा, नेतृत्व, आत्मविश्वास और प्रतिष्ठा से जोड़ा गया है।
यदि कोई रेखा गुरु पर्वत की ओर आकर समाप्त होती है तो उसका अर्थ उस रेखा के मूल स्थान पर निर्भर करेगा।
उदाहरण के लिए जीवनरेखा से निकलकर गुरु पर्वत की दिशा में जाने वाली शाखा को पारंपरिक हस्तरेखा में महत्वाकांक्षा और उन्नति की इच्छा से जोड़ा जाता है।
लेकिन भाग्यरेखा, मस्तिष्करेखा या जीवनरेखा की प्रत्येक शाखा का फल अलग होता है।
इस लिए केवल अंतिम स्थान देखकर निष्कर्ष नहीं निकालना चाहिए।
गुरु पर्वत और विवाह संबंधी संकेत ;
भारतीय हस्तरेखा परंपरा में गुरु पर्वत को विवाह और वैवाहिक सम्मान से भी जोड़ा जाता है, विशेषकर इस लिए कि गुरु को विवाह - संबंधी ज्योतिषीय विचार में महत्वपूर्ण ग्रह माना जाता है।
फिर भी विवाह का निर्णय केवल गुरु पर्वत देखकर नहीं करना चाहिए।
जन्मकुंडली में—
- सप्तम भाव,
- सप्तमेश,
- शुक्र,
- गुरु,
- नवांश,
- दशा-अंतरदशा,
- तथा संबंधित गोचर
का अध्ययन आवश्यक है।
पुरुष और स्त्री की कुंडली में विवाह संबंधी ग्रह - विचार की पारंपरिक पद्धतियाँ भी अलग - अलग संदर्भों में प्रयुक्त होती रही हैं।
इस लिए गुरु पर्वत केवल एक सहायक संकेत हो सकता है, पूर्ण विवाह - निर्णय का अकेला आधार नहीं।
+++
+++
गुरु पर्वत और संतान ;
वैदिक ज्योतिष में संतान विषय के लिए मुख्यतः पंचम भाव, पंचमेश, गुरु तथा संबंधित विभाजित कुंडलियों का विचार किया जाता है।
हस्तरेखा परंपरा में भी संतान संबंधी कुछ सूक्ष्म संकेत बताए जाते हैं, लेकिन इन्हें आधुनिक चिकित्सा या निश्चित भविष्यवाणी का विकल्प नहीं माना जाना चाहिए।
यदि कोई व्यक्ति संतान संबंधी प्रश्न लेकर आए तो जन्मकुंडली में पंचम भाव और गुरु की स्थिति के साथ दशा और गोचर देखना अधिक उचित ज्योतिषीय प्रक्रिया होगी।
+++
+++
प्रश्नकुंडली में गुरु का महत्व ;
जब जन्मसमय निश्चित न हो अथवा किसी तत्काल प्रश्न का उत्तर प्राप्त करना हो, तब पारंपरिक ज्योतिष में प्रश्नकुंडली का उपयोग किया जाता है।
प्रश्न के विषय के अनुसार संबंधित भावों का विचार किया जाता है।
गुरु की स्थिति, उसकी दृष्टि, भावेशत्व तथा प्रश्न से संबंधित भावों के साथ संबंध देखकर निर्णय को पुष्ट किया जा सकता है।
उदाहरण के लिए शिक्षा के प्रश्न में पंचम और चतुर्थ भाव, उच्च शिक्षा में नवम भाव, विवाह में सप्तम भाव तथा आध्यात्मिक विषय में नवम और द्वादश भाव महत्वपूर्ण हो सकते हैं।
इस लिए प्रश्नकुंडली में भी केवल गुरु को देखकर उत्तर देना शास्त्रीय दृष्टि से अधूरा होगा।
+++
+++
गोचर में गुरु का विचार ;
गोचर बृहस्पति लगभग एक वर्ष के आसपास एक राशि में रहने के कारण दीर्घकालीन ज्योतिषीय घटनाओं के अध्ययन में महत्वपूर्ण माना जाता है।
लेकिन गोचर गुरु का फल भी व्यक्ति की जन्मकुंडली से जोड़कर ही देखना चाहिए।
जन्मराशि, लग्न, चंद्रमा, दशा - अंतरदशा और संबंधित भावों के साथ गुरु का गोचर देखा जाए तो फलादेश अधिक व्यवस्थित हो सकता है।
उदाहरण के लिए किसी व्यक्ति के लिए गुरु का गोचर सामान्य रूप से शुभ माना जा सकता है, लेकिन यदि उसी समय उसकी दशा किसी अन्य ग्रह की प्रतिकूल चल रही हो, तो परिणाम मिश्रित हो सकता है।
यही कारण है कि गोचर अकेला फलादेश नहीं है।
+++
+++
अंकशास्त्र में गुरु ;
अंकशास्त्र की विभिन्न भारतीय एवं आधुनिक पद्धतियों में ग्रहों और अंकों के संबंध अलग - अलग तरीके से निर्धारित किए जाते हैं।
सामान्य भारतीय अंकशास्त्रीय परंपरा में 3 अंक को गुरु / बृहस्पति से जोड़ा जाता है।
इस आधार पर जन्मांक, भाग्यांक या नामांक में गुरु - संबंधित अंक की स्थिति का अध्ययन किया जाता है।
लेकिन अंकशास्त्र को वैदिक जन्मकुंडली का समान विकल्प मानना उचित नहीं है।
दोनों की गणना और सिद्धांत अलग हैं।
+++
+++
वास्तु में गुरु तत्व ;
वास्तु परंपरा में दिशा, स्थान, उपयोग, प्रकाश, भार और भवन की संरचना का अध्ययन किया जाता है।
गुरु को व्यापक अर्थ में ज्ञान, देवस्थान और आध्यात्मिकता से जोड़कर देखने की परंपरा भी मिलती है।
फिर भी केवल यह कहना कि गुरु पर्वत खराब है इसलिए घर की कोई दिशा बदल देने से निश्चित भाग्य बदल जाएगा—
ऐसा निष्कर्ष शास्त्रीय रूप से सावधानी के बिना नहीं देना चाहिए।
वास्तु उपाय करते समय भवन की वास्तविक संरचना, उपयोग और प्राकृतिक परिस्थितियों का भी विचार आवश्यक है।
+++
+++
गुरु पर्वत के संकेत पढ़ने का सही नियम ;
गुरु पर्वत पढ़ने की पारंपरिक प्रक्रिया इस प्रकार रखी जा सकती है—
पहला चरण: दोनों हथेलियों को देखें।
दूसरा चरण: गुरु पर्वत की ऊँचाई और बनावट देखें।
तीसरा चरण: तर्जनी अंगुली का आकार और उसकी लंबाई देखें।
चौथा चरण: गुरु पर्वत पर उपस्थित प्रमुख चिह्नों को पहचानें।
पाँचवाँ चरण: जीवनरेखा, मस्तिष्करेखा, हृदयरेखा और भाग्यरेखा से उनका संबंध देखें।
छठा चरण: हाथ की समग्र बनावट और अन्य पर्वतों को देखें।
सातवाँ चरण: यदि उपलब्ध हो तो जन्मकुंडली में बृहस्पति की स्थिति देखें।
आठवाँ चरण: प्रश्न के अनुसार दशा और गोचर से समय का विचार करें।
यही संयुक्त दृष्टिकोण एक अकेले चिह्न के आधार पर किए गए फलादेश से अधिक संतुलित है।
+++
+++
गुरु को मजबूत करने के पारंपरिक उपाय ;
वैदिक परंपरा में बृहस्पति से संबंधित आध्यात्मिक उपायों में गुरु, आचार्य और विद्वानों का सम्मान, ज्ञान का अध्ययन, सत्य एवं सदाचार का पालन, जरूरतमंद विद्यार्थियों की सहायता और भगवान विष्णु की उपासना जैसी परंपराएँ मिलती हैं।
गुरुवार को श्रद्धापूर्वक पूजा, गुरु मंत्र का जप और पीले पदार्थों का दान भी लोक - धार्मिक परंपराओं में प्रचलित हैं।
परंतु किसी व्यक्ति की जन्मकुंडली देखे बिना पीला पुखराज पहनने की सलाह देना उचित नहीं है।
रत्न ग्रह की शक्ति बढ़ाने की धारणा पर आधारित उपाय है और यदि कुंडली में ग्रह की भूमिका अनुकूल न हो तो बिना विचार रत्न धारण करना उचित नहीं माना जाता।
सबसे सरल और सार्वभौमिक उपाय है—
ज्ञान का सम्मान, गुरु का सम्मान, सत्य बोलना, अहंकार से बचना और योग्य व्यक्ति की शिक्षा में सहायता करना।
+++
+++
शास्त्रीय सावधानी ;
ऋग्वेद, श्रीमद्भागवत, भविष्यपुराण, गर्गसंहिता और भृगुसंहिता जैसे ग्रंथों का अपना - अपना विषय और ऐतिहासिक-ग्रंथीय संदर्भ है।
गुरु पर्वत पर बने त्रिभुज, तारा, वर्ग आदि प्रत्येक हस्तचिह्न का विस्तृत फल इन सभी ग्रंथों में एक समान रूप से वर्णित है—
ऐसा दावा करना उचित नहीं होगा।
हस्तसामुद्रिक परंपरा को समझने के लिए सामुद्रिक साहित्य और बाद की हस्तरेखा परंपराओं का संदर्भ लेना अधिक उचित है, जबकि बृहस्पति के ज्योतिषीय फल के लिए वैदिक ज्योतिष की ग्रह - भाव - राशि - दृष्टि - दशा पद्धति अपनाई जाती है।
जातक की हस्तरेखा दार्शनिक है जातक बहुत बुद्धिमान विद्वान तर्ककला मे निपुण बलवीर्य सम्पन्न मृदुभाषी सुन्दर स्वरुप वाला है ।
जातक की जीवन रेखा से गुरु रेखा निकल कर सीधे गुरु पर्वत पर जाती है साथ ही गुरु पर्वत उच्च है।
अतः जातक गाइडेंस करने वाला मास्टर डाक्टर हर काम मे सफल इंसान होगा जातक की मष्तिष्क रेखा चंद्र पर्वत के नीचे ही रूक जाती है ।
अतः जातक अपनी भावुकता के कारण बार बार नुकसान उठा लेता है जातक के पास त्याग भोग समान है।
जितना ही त्याग है उतना ही भोग भी जातक केवल सांसारिक सुख लिए लिए इस धर्मधरा पर आया है।
+++
+++
जातक अच्छा काम करके इस संसार सागर से मोक्ष पाना चाहता है।
जातक को प्रेम बहुत मिलेगा जातक का सूर्य पर्वत दबा हुआ है लेकिन सूर्य रेखा बहुत उत्तम है ।
अतः जातक की जो भी शिक्षा है बहुत उच्च है।
इसी से जातक मान सम्मान सरकार से धन लाभ प्राप्त करेगा।
जातक का शुक्र पर्वत उच्च है अतः जातक की जीवन बहुत सुखद रहेगा।
लक्जरी लाइफ होगी,जातक का बुध पर्वत उच्च है।
अतः जातक चतुर चालाक बहुत गहरी सोच वाला बहुत बुद्धिमान है।
जातक की भाग्य रेखा मणिबंध से चलकर मष्तिष्क रेखा से मिलती है आगे फिर वहां से चलकर शनि पर्वत पर जाती है ।
जहां पर जाकर त्रिकोण बना लेती है।
अतः वैवाहिक जीवन मे उतार - चढ़ाव बना रह सकता है।
+++
+++
राहु रेखा जीवन रेखा को काटते हुए मष्तिष्क रेखा भाग्य रेखा को काटती है इसकी अवधि लगभग 34 वर्ष से 45 वर्ष तक दिखाई देती है।
अतः जातक सब कुछ होने पर भी उस धन का सुख नही पा रहा है मानसिक तनाव बना रहता है जातक को तरल पदार्थ का बिज़नेस सबसे अधिक लाभ पहुंचायेगा।
जातक के हस्तरेखा मे जातक के शुक्र पर्वत उच्च है साथ ही तीन उत्तम संतान रेखा दिखाई देती है।
जातक का मंगल ग्रह भी शुक्र से प्रभावित है अतः प्रेम तो कई लोगो से अच्छा रहेगा लेकिन लोग जातक को उपयोग करेंगे।
जातक को मंगल राहु ग्रह का संयुक्त उपाय करना अनिवार्य विषय है।
अन्यथा जातक को चोट चपेट दुर्घटना,रिस्तो मे कडवाहट,का सामना करना पड़ेगा,धन की कमी नही होगी।
स्वास्थ्य अच्छा रहेगा सोच बडी है ।
बस भोग विलास की तडप बनी रह सकती है।
पेट मे गैस्ट्रिक समस्या कभी - कभार हो सकती है ।
निष्कर्ष ;
गुरु पर्वत हथेली का एक महत्वपूर्ण पर्वत है और पारंपरिक हस्तरेखा - विवेचन में इसे ज्ञान, नेतृत्व, धर्म, सम्मान, गुरु - कृपा, आत्मविश्वास और उच्च आदर्शों से जोड़ा जाता है।
यदि गुरु पर्वत संतुलित हो और उस पर स्पष्ट त्रिभुज, ऊर्ध्व रेखा अथवा अन्य शुभ माने जाने वाले चिह्न दिखाई दें, तो पारंपरिक हस्तरेखा मत में इसे सकारात्मक संकेत माना जा सकता है।
लेकिन किसी व्यक्ति के जीवन का संपूर्ण फल केवल गुरु पर्वत के एक त्रिभुज से तय नहीं किया जा सकता।
सही अध्ययन का क्रम है—
हथेली का संपूर्ण सामुद्रिक परीक्षण + जन्मकुंडली + प्रश्न के अनुसार भाव-विचार + दशा - अंतरदशा + गोचर।
और यदि कृष्णमूर्ति पद्धति का प्रयोग किया जाए तो संबंधित भावों के नक्षत्र स्वामी और उपस्वामी का सूक्ष्म परीक्षण किया जाना चाहिए।
इसी प्रकार नक्षत्र पद्धति, अंकशास्त्र और वास्तु को सहायक दृष्टिकोण के रूप में रखा जा सकता है, लेकिन अलग - अलग शास्त्रों के सिद्धांतों को मिलाकर ऐसा निष्कर्ष नहीं निकालना चाहिए जिसका मूल ग्रंथ में स्पष्ट प्रमाण उपलब्ध न हो।
अतः गुरु पर्वत का वास्तविक रहस्य किसी एक चिह्न में नहीं, बल्कि पर्वत की स्थिति, रेखाओं की गुणवत्ता, अन्य पर्वतों से संबंध और व्यक्ति की जन्मकुंडली के बृहस्पति—
इन सभी के समन्वित अध्ययन में छिपा है।
यही दृष्टिकोण हस्तसामुद्रिक परंपरा को अंधविश्वासपूर्ण चिह्न - पाठ से अलग करके एक व्यवस्थित पारंपरिक अध्ययन के रूप में समझने में सहायता करता है।
!!!!! शुभमस्तु !!!
+++
+++
+++
+++


No comments:
Post a Comment