Wednesday, September 24, 2025

जानें हस्तरेखा से भविष्य..! :

कैसे पढ़ें हथेली में छुपी किस्मत की कहानी :


कैसे पढ़ें हथेली में छुपी किस्मत की कहानी :


हस्तरेखा अध्ययन में सही रोशनी, एकांत, हाथ की बनावट, उंगलियां, नाखून, पर्वत और रेखाओं का क्रमिक निरीक्षण आवश्यक है, जिससे व्यक्ति के स्वभाव, स्वास्थ्य और भविष्य का सटीक आकलन हो सके। 

हस्तरेखा विज्ञान में सूर्योदय का समय महत्वपूर्ण है क्योंकि इस समय रक्त संचार बेहतर होता है। 

हस्तरेखा विशेषज्ञ को व्यक्ति के सामने बैठकर, उचित प्रकाश में हाथ की बनावट, उंगलियों और अंगूठे का विश्लेषण करना चाहिए।







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हस्तरेखाओं को देखने का अद्भुत क्रम :

हस्तरेखा देखने के लिए सूर्योदय का समय अति महत्त्वपूर्ण माना जाता है, प्रातः काल के समय हाथों में रक्त का संचालन प्रबल होता है, इसलिये हस्तरेखाएं और उनका रंग अधिक स्पष्ट दिखाई पड़ता है। 

वैसे तो सफलतापूर्वक हस्तपरीक्षण के लिये कोई विशेष समय नियत नहीं है लेकिन यह हस्तरेखा विशेषज्ञ के उपर निर्भर करता है, जब उसे इष्ट प्रेरणा देते हैं, तब हथेली का हर हिस्सा बोलने लगता है।

हस्तरेखाविद् को हाथ देखने के लिए व्यक्ति के ठीक सामने बैठना चाहिये ताकि रोशनी सीधे उसके हाथों पर पड़े।

हस्तरेखा आदि देखते समय वहां किसी तीसरे व्यक्ति को खड़े होने देना या बैठने देना भी उचित नहीं, क्योंकि ऐसा व्यक्ति अनजाने में दोनों के ध्यान को बंटा सकता है।

हस्तपरीक्षण आरम्भ करते समय व्यक्ति को अपने सामने बैठा कर सबसे पहले यह देखना चाहिए कि हाथ की बनावट किस प्रकार की है।

इसके बाद उंगलियों को देखना चाहिए कि वे हाथ की बनावट से मिलती - जुलती हैं या किसी अन्य प्रकार की हैं।

पहले बायां हाथ देखना चाहिये और तब दायें हाथ को देखना चाहिये कि उसमें बायें हाथ की अपेक्षा क्या - क्या परिवर्तन एवं परिवर्धन आए हैं और तब दायें हाथ को अपने निरीक्षण का आधार बना लेना चाहिये।

प्रसिद्ध हस्तरेखाविद् कीरो के अनुसार महत्त्वपूर्ण विषयों, जैसे बीमारी, मृत्यु, धनहानि, विवाह अथवा किसी घटना के घटने का निष्कर्ष निकालने से पर्व बायें हाथ का परीक्षण करना अत्यावश्यक है।

जिस हाथ का परीक्षण कर रहे हों उसे दृढ़ता से अपने हाथों में पकड़े रहें।

रेखा या चिह्न को भी दबाते रहना चाहिए ताकि उनमें रक्त का प्रवाह भली - भांति होने लगे और परिवर्तन या परिवर्धन होने की सम्भावना स्पष्ट दीख जाए।

इसके साथ ही यह भी आवश्यक है कि हाथ के प्रत्येक भाग, जैसे उसके पीछे का भाग, सामने का भाग, नाखून, त्वचा, रंग, उंगलियां, अंगूठा व मणिबन्ध आदि की परीक्षा भी की जानी चाहिये।

सबसे पहले अंगूठा देखना चाहिये कि वह लम्बा है या छोटा तथा ठीक से विकसित हुआ है या नहीं। 

उसका इच्छाशक्ति वाला पर्व दृढ़ है या लचीला, कमजोर है या सशक्त। 

उसके बाद हथेली को देखना चाहिए कि वह कठोर या कोमल कैसी है।

इसके बाद उंगलियों पर ध्यान देना चाहिए, ध्यानपूर्वक देखना चाहिए कि हथेली से उनका अनुपात क्या है। 

वे लम्बी हैं या छोटी। 

उसके बाद उनकी श्रेणी निर्धारित करें, वे चमचाकार हैं या वर्गाकार, यदि वे मिश्रित हैं तो हर उंगली को 

सावधानीपूर्वक देखते हुए प्रत्येक की श्रेणी निर्धारित करें। 

तत्पश्चात् नाखूनों को देखें और उनसे व्यक्ति के स्वभाव और स्वास्थ्य का ज्ञान करें। 

अन्त में सारे हाथ को सावधानी से देखते हुए पर्वतों पर ध्यान केन्द्रित करें और देखें कि कौन - कौन सा पर्वत प्रमुखता लिये हुए है।

इसके बाद रेखाओं पर आएं, यह देखने के लिए कि कौन - सी रेखा पहले देखी जाए कोई निश्चित नियम नहीं है, परन्तु फिर भी जीवन रेखा और स्वास्थ्य रेखा को एक साथ लेकर परीक्षण आरम्भ किया जाना चाहिए। 
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उसके बाद मस्तिष्क रेखा, फिर भाग्य रेखा और उसके बाद हृदय रेखा आदि पर ध्यान देना चाहिए।

विवाह रेखा आपकी शादी के बारे में खोलती है ये बड़े राज, जानें अपनी रेखा का रहस्य :

ज्योतिषशास्त्र के प्रकार ही हस्तरेखा शास्त्र का भी बेहद खास महत्व होता है। 

इसमें मनुष्य की हाथ की रेखाओं और पर्वतों को देखकर उसके स्वभाव, जीवन व भविष्य के बारे में जाना जाता है। 

हस्तरेखा शास्त्र में हृदय रेखा, भाग्य रेखा, जीवन रेखा आदि का वर्णन मिलता है। 

इन्हीं में से एक है विवाह रेखा जिसे देखकर आप अपनी शादी के बारे में कई बड़ी बातें जान सकते हैं। 

यह रेखा हथेली में छोटी उंगली के नीचे और हृदय रेखा के ऊपर मौजूद होती है। 

इस से शादी के बारे में मनुष्य को कई छोटे-बड़े संकेत मिल सकते हैं। 

आज हम आपको विस्तार से बताएंगे कि लंबी, टूटी हुई, दोहरी आदि विवाह रेखाओं का क्या अर्थ होता है और यह हमें क्या संकेत देते हैं।

हस्तरेखा शास्त्र में विवाह रेखा का विशेष महत्व है, जो हथेली पर छोटी उंगली के नीचे स्थित होती है। 

यह रेखा व्यक्ति के विवाह और वैवाहिक जीवन से जुड़े कई संकेत देती है। 

लंबी, टूटी हुई या दोहरी विवाह रेखाएं शादी के बारे में महत्वपूर्ण जानकारी प्रदान करती हैं, जिससे भविष्य का अनुमान लगाया जा सकता है।

मस्तिष्करेखा व हृदयरेखा के मध्य दूषित भाग्यरेखा :

( निर्णय सावधानी से )

मनुष्य के जीवन में एक दूसरा एवं सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण बदलाव आता है...! 

आयु के 30 व 45 वर्ष के मध्य और यह समय प्रायः मस्तिष्क व हृदय रेखा के मध्य की दूरी का होता है। 
व्यापारी वर्ग के जीवन में यह एक संक्रान्ति काल होता है, जिस समय उन्हें रुपयों की सर्वाधिक आवश्यकता रहती है। 

क्योंकि इसी उम्र में व्यक्ति बड़े कारोबार या उद्योग के मार्फत अपनी पूंजी दांव पर लगाता है तथा यह काल व्यक्ति के जीवन में प्रायः उसके स्वतन्त्र अस्तित्व एवं निर्णय शक्ति से प्रभावित होता है। 

क्योंकि इसके ( 30 साल के ) पूर्व का जीवन व्यक्ति माता - पिता, अपने बड़े बुजुर्गों की राय, धन या प्रभाव में व्यतीत करता है। 

जैसे जैसे समय बीतता जाता है, जातक बड़ा होता है, वैसे - वैसे अपनी बुद्धि व रुचि के अनुसार कार्य करने की प्रवृत्ति से प्रभावित होता है। 

यदि इस समय सही मार्ग मिल जाता है तो जातक उन्नति के पथ की ओर स्थायी रूप से आगे बढ़ जाता है। 

यदि इस समय निर्णय गलत हो जाते हैं तो जातक को पछताना पड़ता है एवं अपनी अनुभवहीनता का हर्जाना भुगतना पड़ता है। 

मस्तिष्करेखा एवं हृदयरेखा के मध्य वाले अन्तराल ( 30 से 45 वर्ष ) में ज्यादातर शनिरेखा दूषित पाई जाती है। 

जबकि बचपन से मस्तिष्करेखा के नीचे तक अर्थात 25 से 30 वर्ष की आयु तक अधिकतम भाग्य रेखाएं गहरी ही पाई जाती हैं।

आपका अपना पंडित प्रभुलाल पी. वोरिया, क्षत्रिय राजपूत जडेजा कुल गुरु का " जय द्वारकाधीश"
पंडित प्रभुलाल पी. वोरिया क्षत्रिय राजपूत जडेजा कुल गुरु :-
प्रोफेस्सिनोल ज्योतिष एक्सपर्ट :-
-: 1987 वर्ष से ऊपर ज्योतिष का अनुभव  :-
श्री सरस्वती ज्योतिष कार्यालय
(2 गोल्ड मेडलिस्ट ज्योतिष और वास्तु साईंन्स )
" श्री आलबाई निवास  ", महा प्रभुजी बैठक के पास ,
एस टी. बस स्टेसन के सामने,  बैठक रोड ,
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