जानें हस्तरेखा से भविष्य :
जानें हस्तरेखा से भविष्य...!
उत्तम भाग्य रेखा ( उत्पत्ति ) :
उत्तम भाग्य रेखा का रहस्य — उत्पत्ति-स्थान से जानें कर्म, भाग्य और जीवन की दिशा :
मणिबन्ध स्थल से उदित होकर शनि पर्वत तक निर्दोष रूप से पहुंचने वाली रेखा उत्तम भाग्य रेखा की श्रेणी में आती है।
इसे Rascetterian Fate-line कहते हैं।
(परिणाम)
ऐसे जातक का जन्म ऊंचे कुल में होता है तथा अपने परिश्रम व पुरुषार्थ से स्वयं का भाग्योदय करता है।
मैं इसे सर्वश्रेष्ठ भाग्यरेखा मानता हूं।
ऐसे जातक की कुण्डली के केन्द्र-त्रिकोण में पापग्रह अच्छी स्थिति में होते हैं।
Pk & Pk Jewellers Glass Ganesh Ji Tabletop | 24Kt Gold | Rectangular Carving Frame | Medium Size [9X11 Cm] (For Premium Gift, Office Desk, Car Dashboard, Table Decoration)
| { Colour | Gold |
| Brand | Pk & Pk Jewellers |
| Theme | Religious |
| Material | Gold |
| Style | 04-Carving-Medium |
| Recommended Uses For Product } | Home |
{ About this item
- Divine Presence: This table top showcases Lord Ganesh Ji, seated on a singhasan, bestowing blessings, enclosed within high-quality transparent glass, symbolizing wisdom, prosperity, and grace.
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भारतीय ज्योतिष एवं सामुद्रिक परंपरा में मनुष्य के जीवन को समझने के लिए केवल जन्मकुंडली को ही आधार नहीं माना गया, बल्कि शरीर के लक्षण, अंगों की बनावट, हथेली के चिह्न और रेखाओं का भी अध्ययन किया गया है।
इस व्यापक परंपरा को सामुद्रिकशास्त्र तथा हस्तसामुद्रिक विद्या के अंतर्गत समझा जाता है।
वैदिक ज्योतिष की दृष्टि से जन्म के समय ग्रहों की स्थिति जीवन की संभावनाओं, कर्मक्षेत्र, धन, प्रतिष्ठा, संघर्ष और उपलब्धियों का संकेत देती है, जबकि हस्तरेखा परंपरा हथेली पर दिखाई देने वाले चिह्नों और रेखाओं को व्यक्ति के जीवन-प्रवाह के संकेत के रूप में देखती है।
यहाँ एक शास्त्रीय सावधानी अत्यंत आवश्यक है।
आधुनिक समय में जिस खड़ी रेखा को सामान्यतः “भाग्यरेखा” कहा जाता है, उसके प्रत्येक आधुनिक नाम, प्रत्येक आरंभ - बिंदु और प्रत्येक फल को सीधे ऋग्वेद अथवा किसी पुराण का मूल नियम कहना उचित नहीं है।
प्राचीन सामुद्रिक साहित्य में हथेली की रेखाओं और चिह्नों का वर्णन अवश्य मिलता है।
उदाहरण के लिए वराहमिहिर की बृहत्संहिता में हथेली की रेखाओं के आकार, गहराई तथा कलाई से निकलकर हथेली में ऊपर जाने वाली रेखाओं के फल का वर्णन है।
बृहत्पाराशर होराशास्त्र में भी शरीर और हथेली के लक्षणों का स्वतंत्र वर्णन मिलता है।
भाग्यरेखा वास्तव में क्या देखती है ?
हस्तसामुद्रिक परंपरा में भाग्यरेखा को सामान्यतः हथेली के निचले भाग से ऊपर की ओर जाने वाली रेखा के रूप में देखा जाता है।
इसका अंतिम क्षेत्र प्रायः मध्यमा उंगली के नीचे स्थित शनि पर्वत की दिशा में माना जाता है।
आधुनिक हस्तरेखा - पद्धतियों में इसे कर्म, व्यवसाय, जीवन की दिशा, जिम्मेदारी और बाहरी परिस्थितियों से संबंधित रेखा माना जाता है।
लेकिन इसे केवल “भाग्य की रेखा” समझ लेना अधूरा दृष्टिकोण है।
किसी व्यक्ति की सफलता केवल एक रेखा देखकर निर्धारित नहीं की जाती।
हथेली की बनावट, पर्वत, जीवनरेखा, मस्तिष्करेखा, हृदयरेखा, सूर्यरेखा, सहायक रेखाएँ, रेखा की गहराई, रंग, स्पष्टता तथा उसके आसपास के चिह्नों को साथ लेकर विचार करना अधिक उचित है।
प्राचीन बृहत्संहिता में हथेली की गहरी और चमकदार रेखाओं को समृद्धि से जोड़ा गया है तथा हथेली में विशेष आकृतियों वाली रेखाओं के भी अलग - अलग फल बताए गए हैं।
वहाँ तीन रेखाओं के कलाई से निकलकर हथेली के मध्य तक पहुँचने का भी उल्लेख मिलता है।
हथेली के मध्य से जीवनरेखा के आस-पास से कोई रेखा उदित होकर निर्दोष रूप में बुध पर्वत की ओर जाती हो तो यह भी उत्तम भाग्य रेखा की श्रेणी में आती है।
इसे Mercurian fate-line कहते हैं।
(परिणाम)
ऐसा व्यक्ति व्यापार करेगा एवं व्यापार के द्वारा ही इसका सुन्दर - सुखद भाग्योदय होता है।
बड़े - बड़े उद्योगपतियों के हाथ में यह रेखा देखी गई है।
इसे बुधरेखा या स्वास्थ्यरेखा न समझें। ऐसे जातक की कुण्डली में 'मूडयेण' होता है।
उत्तम भाग्यरेखा की पहचान :
परंपरागत हस्तसामुद्रिक विचार में उत्तम भाग्यरेखा सामान्यतः ऐसी मानी जाती है जो स्पष्ट, गहरी, सुगठित और अनावश्यक टूटन से रहित हो।
रेखा बहुत अधिक धुंधली, अत्यधिक जंजीरदार या अनेक स्थानों पर बिखरी हुई हो तो उसके फल को सरल रूप से “भाग्य खराब” कहना उचित नहीं है।
उसका अर्थ जीवन में दिशा बदलना, परिस्थितियों के अनुसार कर्मक्षेत्र बदलना अथवा स्थिरता प्राप्त करने में अधिक समय लगना भी माना जा सकता है।
उत्तम रेखा का सबसे महत्वपूर्ण विषय केवल उसकी लंबाई नहीं बल्कि उसका उत्पत्ति-स्थान है।
यही कारण है कि किसी भी हथेली का परीक्षण करते समय सबसे पहले यह देखना चाहिए कि रेखा कहाँ से उठ रही है और किस दिशा में जा रही है।
चन्द्रमा से निकलकर शनि पर्वत तक जाने वाली निर्दोष रेखा उत्तम भाग्यरेखा की श्रेणी में आती है। इसे Saturn-line भी कहते हैं।
(परिणाम)
विवाह के बाद भाग्योदय। ऐसे जातक की जन्मकुण्डली में शनि + चन्द्र की स्थिति केन्द्र + त्रिकोण में बहुत ही सुदृढ़ होती है।
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भाग्यरेखा का उत्पत्ति-स्थान :
१. मणिबंध से उठने वाली भाग्यरेखा
यदि भाग्यरेखा कलाई के समीप मणिबंध क्षेत्र से स्पष्ट रूप से ऊपर उठती हुई दिखाई देती है और धीरे - धीरे हथेली के मध्य से होकर शनि पर्वत की दिशा में जाती है, तो आधुनिक हस्तसामुद्रिक परंपरा इसे जीवन में अपेक्षाकृत स्पष्ट कर्म - दिशा का संकेत मानती है।
ऐसी रेखा वाले व्यक्ति के जीवन में काम, जिम्मेदारी और अपने प्रयास से आगे बढ़ने की प्रवृत्ति को महत्व दिया जाता है।
यदि रेखा गहरी, सीधी और साफ हो तो परंपरागत व्याख्या में जीवन की दिशा अधिक व्यवस्थित मानी जाती है।
यहाँ भी केवल रेखा देखकर यह निश्चित नहीं किया जाना चाहिए कि व्यक्ति अवश्य ही बहुत धनवान बनेगा।
धन के लिए धनरेखा, सूर्यरेखा, गुरु पर्वत, शुक्र पर्वत तथा जन्मकुंडली के द्वितीय, दशम और एकादश भाव का विचार भी आवश्यक है।
चन्द्रमा के पर्वत से उदित होकर सूर्य पर्वत तक जाने वाली निर्दोष रेखा, उत्तम भाग्य रेखा की श्रेणी में आती है।
इसे Apollo-line भी कहते हैं।
(परिणाम)
जीवनसाथी सौन्दर्य, प्रेम व प्रतिभा' सम्पन्न विवाह के बाद भाग्योदय।
ऐसे जातक की कुण्डली में सूर्य की स्थिति केन्द्र - त्रिकोण में बहुत सुदृढ़ होती है।
२. जीवनरेखा से उठने वाली भाग्यरेखा :
यदि भाग्यरेखा जीवनरेखा के निकट से या उससे जुड़कर ऊपर उठती है, तो आधुनिक हस्तरेखा परंपरा इसे स्वयं के परिश्रम, परिवार की परिस्थितियों तथा धीरे - धीरे विकसित होने वाली सफलता से जोड़ती है।
ऐसी स्थिति में प्रारंभिक जीवन में व्यक्ति को अपने आधार को मजबूत करने के लिए अधिक मेहनत करनी पड़ सकती है।
आगे चलकर उसी अनुभव का उपयोग करके कर्मक्षेत्र में उन्नति का मार्ग खुलने की पारंपरिक व्याख्या की जाती है।
लेकिन यहाँ “जीवनरेखा से जुड़ना” अपने आप में न शुभ है न अशुभ।
रेखा का रंग, गहराई, उसके बाद की निरंतरता और अन्य रेखाओं के संबंध को भी देखना आवश्यक है।
इसे Jupiterian fate line भी कहते हैं।
(परिणाम)
उत्तम शिक्षा व विवाह के बाद भाग्योदय।
ऐसे जातक की जन्म कुण्डली प्रायः 'हंसयोग' पाया जाता है।
Indianara Lord Ganesha Painting With Frame 18 Inches X 12 Inches
| { Size | 45L x 30W cm |
| Product Dimensions | 45L x 30W Centimeters |
| Item Weight | 600 g |
| Number of Items | 1 |
| Orientation | Portrait |
| Shape | Rectangular |
| Theme | Religious |
| Frame Type | Framed |
| Wall art form | Painting |
| Material | Engineered Wood } |
{ About this item
- Item Dimensions: Set of One 18 X 12 inches
- Frame Design: Multicolored Frame adds vibrant appeal to your wall decor
- Material used: Digitally Printed Paper, Synthetic Wood, MDF, Hanging Hook
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- Religious Theme: Features Lord Ganesha artwork that brings spiritual ambiance to your space }
३. चंद्र पर्वत से उठने वाली भाग्यरेखा :
हथेली के बाहरी निचले भाग को परंपरा में चंद्र पर्वत कहा जाता है।
वहाँ से भाग्यरेखा ऊपर उठे तो आधुनिक हस्तसामुद्रिक व्याख्या में दूसरे लोगों, जनता, सहयोगियों, साझेदारी, यात्राओं या बाहरी परिस्थितियों से मिलने वाले अवसरों से जोड़ा जाता है।
ऐसी रेखा को विशेष रूप से उन व्यवसायों के संदर्भ में देखा जाता है जहाँ व्यक्ति का कार्य जनता, ग्राहकों, यात्राओं या दूसरे लोगों के सहयोग पर निर्भर करता है।
फिर भी इसे “दूसरों के भरोसे का भाग्य” कहकर सीमित करना उचित नहीं है।
व्यक्ति की वास्तविक जीवन - दिशा जानने के लिए जन्मकुंडली के दशम भाव, दशमेश, शनि, सूर्य, बुध, गुरु और संबंधित दशा - अंतरदशा का परीक्षण आवश्यक है।
४. हथेली के मध्य से प्रारंभ होने वाली रेखा :
यदि भाग्यरेखा हथेली के निचले भाग से स्पष्ट रूप से न उठकर मध्य भाग से दिखाई देती है, तो हस्तसामुद्रिक परंपरा इसे जीवन में बाद में स्पष्ट होने वाली कर्म - दिशा से जोड़ती है।
ऐसे व्यक्ति को प्रारंभिक अवस्था में व्यवसाय, नौकरी या जीवन की दिशा चुनने में परिवर्तन करना पड़ सकता है।
अनुभव बढ़ने के साथ उसे अपनी वास्तविक क्षमता और उपयुक्त क्षेत्र का ज्ञान हो सकता है।
इस का अर्थ असफलता नहीं है।
कई बार देर से स्पष्ट होने वाली दिशा ही जीवन में अधिक स्थायी उपलब्धि का कारण बनती है।
शनि पर्वत की दिशा में जाने वाली रेखा :
भाग्यरेखा का संबंध परंपरागत हस्तरेखा - पद्धति में शनि पर्वत से जोड़ा जाता है।
शनि कर्म, अनुशासन, जिम्मेदारी, विलंब, परिश्रम और परिणाम का प्रतीक माना जाता है।
इस लिए भाग्यरेखा को केवल अचानक मिलने वाले धन की रेखा मानना गलत है।
एक अच्छी भाग्यरेखा को अधिक उचित रूप से कर्म की दिशा और जीवन की स्थिरता के संकेत के रूप में समझना चाहिए।
यदि रेखा स्पष्ट है लेकिन बीच में हल्की हो जाती है, तो परंपरा इसे जीवन के किसी चरण में दिशा या परिस्थितियों के परिवर्तन से जोड़ती है।
यदि आगे जाकर रेखा पुनः मजबूत हो जाए, तो परिवर्तन के बाद स्थिरता की व्याख्या की जाती है।
भाग्यरेखा में टूटन का अर्थ :
भाग्यरेखा में टूटन दिखाई देना देखकर डरना सबसे बड़ी भूल है।
हस्तरेखा की परंपरा में टूटन को कई प्रकार से देखा जाता है।
एक छोटी टूटन को छोटे स्तर के परिवर्तन, काम में रुकावट या अस्थायी दिशा - परिवर्तन से जोड़ा जा सकता है।
बड़ी और स्पष्ट टूटन को करियर, व्यवसाय, निवास, जिम्मेदारी या जीवन की दिशा में बड़े परिवर्तन का संकेत माना जाता है।
यदि टूटन के बाद रेखा उसी दिशा में दोबारा मजबूत होकर चलती है, तो पारंपरिक अर्थ में इसे परिवर्तन के बाद पुनः स्थिरता का संकेत माना जाता है।
यदि नई रेखा पहले वाली रेखा से थोड़ी अलग दिशा में चलती है, तो जीवन की दिशा बदलने की व्याख्या अधिक प्रबल मानी जाती है।
इस लिए “भाग्यरेखा टूटी = दुर्भाग्य” कहना सामुद्रिक अध्ययन की दृष्टि से अत्यधिक सरल निष्कर्ष है।
जन्मकुंडली के साथ भाग्यरेखा का परीक्षण :
सटीक ज्योतिषीय परीक्षण के लिए जन्मकुंडली और हथेली को एक - दूसरे का विकल्प नहीं, बल्कि अलग - अलग संकेत - प्रणालियों के रूप में देखना अधिक उचित है।
जन्मकुंडली में कर्म और व्यवसाय के लिए दशम भाव तथा दशमेश का विचार किया जाता है।
धन के लिए द्वितीय और एकादश भाव, भाग्य के लिए नवम भाव, संघर्ष के लिए षष्ठ भाव तथा परिवर्तन के लिए अष्टम भाव का विचार किया जाता है।
शनि की स्थिति, बल, दृष्टि, युति तथा दशा - अंतरदशा कर्मक्षेत्र और जिम्मेदारियों के अध्ययन में महत्वपूर्ण मानी जाती है।
गोचर में विशेषकर शनि और गुरु की स्थिति को संबंधित जन्मकुंडली के संदर्भ में देखा जाता है।
इसलिए यदि हथेली में भाग्यरेखा कमजोर दिखाई दे लेकिन जन्मकुंडली में दशम भाव अत्यंत मजबूत हो, तो केवल हथेली देखकर व्यक्ति को “भाग्यहीन” कहना उचित नहीं होगा।
इसी प्रकार यदि हथेली पर सुंदर भाग्यरेखा हो लेकिन जन्मकुंडली में वर्तमान दशा संघर्षपूर्ण हो, तो सफलता में समय लग सकता है।
प्रश्नकुंडली और भाग्यरेखा :
प्रश्नकुंडली किसी विशेष समय पूछे गए प्रश्न का ज्योतिषीय परीक्षण है।
यदि प्रश्न हो —
“क्या मुझे नया व्यवसाय शुरू करना चाहिए?”,
“क्या नौकरी बदलना उचित होगा?”
या “क्या रुका हुआ कार्य पूरा होगा?” —
तो प्रश्नकुंडली में संबंधित भाव, भावेश, ग्रह, चंद्रमा तथा कार्य की प्रकृति के अनुसार निर्णय किया जाता है।
हथेली की भाग्यरेखा को प्रश्नकुंडली का स्थानापन्न नहीं बनाया जाना चाहिए।
अर्थात भाग्यरेखा संभावित जीवन - दिशा के अध्ययन में सहायक संकेत हो सकती है, जबकि प्रश्नकुंडली किसी विशेष प्रश्न और समय का स्वतंत्र ज्योतिषीय परीक्षण है।
गोचर का संबंध :
गोचर में ग्रह वर्तमान समय में किस राशि और भाव से गुजर रहे हैं, यह देखा जाता है।
विशेषकर शनि का गोचर व्यक्ति के कर्म, जिम्मेदारी, देरी और अनुशासन से संबंधित विषयों को सक्रिय करने वाला माना जाता है।
यदि जन्मकुंडली में कर्मक्षेत्र मजबूत हो और उसी समय अनुकूल दशा तथा गोचर का समर्थन मिले, तो परंपरागत ज्योतिषीय दृष्टि से उपलब्धि का समय अधिक महत्वपूर्ण माना जा सकता है।
लेकिन केवल किसी एक ग्रह के गोचर को हथेली की किसी एक रेखा से जोड़कर निश्चित भविष्यवाणी करना शास्त्रीय रूप से सावधानीपूर्ण तरीका नहीं है।
शास्त्रीय प्रमाण क्या कहते हैं ?
वराहमिहिर की बृहत्संहिता में अंगविद्या के अंतर्गत पुरुष और स्त्री के शरीर तथा हथेली के लक्षणों का वर्णन मिलता है।
हथेली की गहरी और चमकदार रेखाओं को धन - संपत्ति से जोड़ा गया है और विभिन्न विशेष आकृतियों वाली रेखाओं के अलग - अलग फल बताए गए हैं।
कुछ स्थानों पर कलाई से निकलने वाली रेखाओं तथा हथेली में ऊपर जाने वाली रेखाओं का भी वर्णन मिलता है।
बृहत्पाराशर होराशास्त्र के एक अध्याय में भी हथेली, हाथ की बनावट और हथेली की रेखाओं के लक्षणों का वर्णन मिलता है।
वहाँ स्पष्ट, गहरी तथा विशेष चिह्नों वाली रेखाओं को विभिन्न शुभ फलों से जोड़ा गया है।
इस लिए यह कहना उचित है कि भारतीय ज्योतिषीय - सामुद्रिक साहित्य में हथेली के लक्षणों का प्राचीन आधार मौजूद है।
लेकिन आधुनिक इंटरनेट पर प्रचलित हर “भाग्यरेखा” नियम को सीधे ऋग्वेद, भविष्यपुराण या भृगु संहिता का मूल मंत्र या श्लोक बताना उचित नहीं है।
यही शास्त्रीय ईमानदारी किसी भी गंभीर ज्योतिषीय लेख की सबसे महत्वपूर्ण विशेषता है।
उपाय के विषय में सावधानी :
भाग्यरेखा देखकर तुरंत महंगे रत्न, विशेष पूजा या किसी निश्चित उपाय की सलाह देना उचित नहीं है।
यदि जन्मकुंडली में शनि संबंधित दोष या दुर्बलता स्पष्ट रूप से दिखाई दे और ज्योतिषीय परंपरा के अनुसार उपाय उचित हो, तो शनिवार को संयम, सेवा, श्रम, जरूरतमंद व्यक्ति की सहायता, तिल का दान, शनिदेव की उपासना अथवा शनि मंत्र - जप जैसे पारंपरिक उपाय किए जाते हैं।
परंतु उपाय का चयन जन्मकुंडली, दशा और वास्तविक जीवन - परिस्थिति देखकर करना अधिक उचित है।
केवल हथेली की एक रेखा के आधार पर उपाय निर्धारित नहीं किया जाना चाहिए।
अंतिम रहस्य :
उत्तम भाग्यरेखा का अर्थ यह नहीं कि व्यक्ति बिना प्रयास के सफल हो जाएगा।
भारतीय कर्म - दर्शन में पुरुषार्थ का महत्व अत्यंत बड़ा है।
हस्तरेखा को यदि परंपरागत दृष्टि से देखा जाए तो वह जीवन के कर्म - पथ, दिशा और परिस्थितियों के संकेतों का अध्ययन है; उसे मनुष्य के पूरे भविष्य का अंतिम और अपरिवर्तनीय निर्णय नहीं मानना चाहिए।
इसलिए भाग्यरेखा को पढ़ते समय पाँच बातें विशेष रूप से देखें—
उत्पत्ति-स्थान → रेखा की गहराई → निरंतरता → समाप्ति की दिशा → अन्य रेखाओं और जन्मकुंडली से संबंध।
यही संयुक्त अध्ययन किसी भी हथेली को केवल “अच्छी” या “खराब” कहने की अपेक्षा अधिक सूक्ष्म अर्थ देता है।
अंततः शास्त्रीय दृष्टि से सबसे संतुलित निष्कर्ष यही है कि रेखा संकेत देती है, कर्म दिशा बनाता है और ज्योतिषीय परीक्षण उस दिशा को समय तथा परिस्थितियों के संदर्भ में समझने का प्रयास करता है।
भाग्यरेखा में परिवर्तन दिखाई दे तो उसे भय का कारण न बनाकर जीवन में परिवर्तन, जिम्मेदारी और पुरुषार्थ के संकेत के रूप में समझना अधिक उचित है।
श्री वैदिक ज्योतिषशास्त्रविद्या, श्री खगोड़शास्त्रविद्या (श्री नक्षत्रपद्धतिविधा), श्री कृष्णमूर्तिपद्धतिविधा, श्री अंकशास्त्रविधा, श्री हस्तरेखाशास्त्रविधा, श्री सामुद्रिकशास्त्रविधा, श्री वास्तुशास्त्रविधा, श्री ऋग्वेद, श्री भविष्यपुराण, श्री भृगु संहिता और श्री गर्ग संहिता सहित भारतीय ज्ञान - परंपराओं के अध्ययन में मूल ग्रंथ और परंपरागत व्याख्या के बीच अंतर समझना ही वास्तविक शास्त्रीय प्रमाणिकता है। !!!!! शुभमस्तु !!!
🙏हर हर महादेव हर...!!
जय माँ अंबे ...!!!🙏🙏
पंडित राज्यगुरु प्रभुलाल पी. वोरिया क्षत्रिय राजपूत जड़ेजा कुल गुर: -
श्री सरस्वति ज्योतिष कार्यालय
PROFESSIONAL ASTROLOGER EXPERT IN:-
-: 1987 YEARS ASTROLOGY EXPERIENCE :-
(2 Gold Medalist in Astrology & Vastu Science)
" Opp. Shri Satvara vidhyarthi bhuvn,
" Shri Aalbai Niwas "
Shri Maha Prabhuji bethak Road,
JAM KHAMBHALIYA - 361305 (GUJRAT )
सेल नंबर: . + 91- 9427236337 / + 91- 9426633096 ( GUJARAT )
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आप इसी नंबर पर संपर्क/सन्देश करें...धन्यवाद..
नोट ये मेरा शोख नही हे मेरा जॉब हे कृप्या आप मुक्त सेवा के लिए कष्ट ना दे .....
जय द्वारकाधीश....
जय जय परशुरामजी...🙏🙏🙏


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